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छठ पूजा की कथा

छठ की प्रचलित कथा राजा प्रियव्रत की है, जिनके मृत जन्मे पुत्र को षष्ठी देवी (छठी मैया) ने जीवित किया। तब से संतान और परिवार के सुख के लिए षष्ठी तिथि को छठी मैया और सूर्य देव की पूजा होती है।

छठ पूजा (संध्या अर्घ्य) 2026: 15 नवंबर 2026, रविवार — तिथि और पूजा का समय देखें

छठ पूजा की कथा

राजा प्रियव्रत की कथा

बहुत समय पहले प्रियव्रत नाम के राजा और उनकी रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने उनके लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया और रानी को यज्ञ की खीर खाने को दी।

रानी को पुत्र हुआ, पर वह मृत पैदा हुआ। दुखी राजा पुत्र को लेकर श्मशान गए और शोक में अपने प्राण त्यागने लगे। तभी आकाश से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं।

देवी ने कहा, ‘मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना हूँ। सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मुझे षष्ठी देवी कहते हैं। तुम मेरी पूजा करो और दूसरों से भी करवाओ।’ देवी के स्पर्श से बालक जीवित हो उठा।

राजा ने षष्ठी तिथि को देवी की पूजा की और पूरे राज्य में इसका प्रचार किया। तभी से छठी मैया की पूजा संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली के लिए होती है।

सूर्य उपासना की दूसरी कथाएँ

एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर माता सीता और श्रीराम ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव की उपासना की थी। महाभारत में सूर्य पुत्र कर्ण रोज़ घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे, और द्रौपदी ने भी पांडवों के कष्ट दूर करने के लिए छठ व्रत रखा था।

छठ में डूबते और उगते, दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह संदेश देता है कि जीवन के हर पड़ाव का सम्मान करना चाहिए।

यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

छठी मैया कौन हैं?

छठी मैया को षष्ठी देवी या देवसेना कहते हैं। मान्यता है कि वे बच्चों की रक्षा करती हैं और सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं।

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