शिव जी ने सुनाई कथा
एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा, ‘हे पार्वती, तुम्हें अपना पिछला जन्म याद नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ जिससे तुमने मुझे पाया।’
शिव जी बोले, ‘तुमने मुझे पति रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया, पर हर बार सफल नहीं हुईं। 108वें जन्म में तुम पर्वतराज हिमालय के घर पैदा हुईं। तुमने हिमालय पर कठोर तप किया — गर्मी में धूप में, बारिश में खुले आसमान के नीचे और सर्दी में पानी में खड़े होकर। सूखे पत्ते खाकर और फिर उन्हें भी छोड़कर तुमने तपस्या की।’
‘तुम्हारी यह हालत देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुखी थे। उसी समय नारद मुनि भगवान विष्णु की ओर से तुम्हारे विवाह का प्रस्ताव लेकर आए और हिमालय मान गए। पर तुम्हारा मन तो मुझमें था।’
‘तुमने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी। तुम्हारी अटूट श्रद्धा देखकर सावन के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मैं प्रसन्न हुआ और तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वचन दिया।’
शिव जी ने कहा, ‘जो स्त्री इस दिन श्रद्धा से व्रत रखकर हमारी पूजा करेगी और यह कथा सुनेगी, उसे अखंड सौभाग्य मिलेगा।’
पूजा कैसे करें
सुहागिनें हरे कपड़े और हरी चूड़ियाँ पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और झूला झूलती हैं। शाम को शिव-पार्वती की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करती हैं और माता पार्वती को सुहाग का सामान चढ़ाती हैं। मायके से आया ‘सिंधारा’ (घेवर, मिठाई, कपड़े) इस तीज की ख़ास परंपरा है।
यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

