अब लौं नसानी — तुलसीदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘अब लौं नसानी’ तुलसीदास की रचना है। तुलसीदास संकल्प लेते हैं — अब तक का जीवन व्यर्थ गया, अब नहीं जाने दूँगा। राम-कृपा से संसार की रात बीत गई और मैं जाग गया। राम-नाम रूपी चिंतामणि मिल गई है, उसे हाथ से नहीं छोड़ूँगा; मन रूपी भौंरा अब रघुपति के चरण कमलों में ही बसेगा।
तुलसीदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

अब लौं नसानी, अब न नसैहौं। राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥ पायेउँ नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं। स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं॥ परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं। मन मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद-कमल बसैहौं॥
भावार्थ: तुलसीदास संकल्प लेते हैं — अब तक का जीवन व्यर्थ गया, अब नहीं जाने दूँगा। राम-कृपा से संसार की रात बीत गई और मैं जाग गया। राम-नाम रूपी चिंतामणि मिल गई है, उसे हाथ से नहीं छोड़ूँगा; मन रूपी भौंरा अब रघुपति के चरण कमलों में ही बसेगा।
अब लौं नसानी — तुलसीदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
