श्री राम चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘श्री रघुबीर भक्त हितकारी’ वाली राम चालीसा हरिदास जी की रचना है। शुरुआत में एक श्लोक में पूरी रामायण आती है, फिर श्रीराम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और हनुमान की महिमा।
राम नवमी, दशहरा और रोज़ सुबह हनुमान चालीसा के साथ।

आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणम्। बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननं एतद्धि रामायणम्॥
(एक श्लोकी रामायण) राम का वन जाना, सोने के हिरण का वध, सीता-हरण, जटायु की मृत्यु, सुग्रीव से मित्रता, बाली-वध, समुद्र पार करना, लंका-दहन, फिर रावण और कुंभकर्ण का वध — यही पूरी रामायण है।
चौपाई
श्री रघुबीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
हे भक्तों का भला करने वाले रघुवीर, हमारी विनती सुन लीजिए।
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥
जो दिन-रात आपका ध्यान करता है, उसके जैसा भक्त कोई नहीं।
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
शिव जी मन में आपका ध्यान करते हैं; ब्रह्मा और इंद्र भी आपका पार नहीं पाते।
जय जय जय रघुनाथ कृपाला। सदा करो सन्तन प्रतिपाला॥
हे कृपालु रघुनाथ, आपकी जय हो; आप सदा संतों का पालन करते हैं।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना॥
वीर हनुमान आपके दूत हैं, जिनका प्रभाव तीनों लोक जानते हैं।
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
हे कृपालु, आपकी भुजाएँ प्रचंड हैं; आपने रावण को मारकर देवताओं की रक्षा की।
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं। दीनन के हो सदा सहाई॥
हे स्वामी, आप अनाथों के नाथ और दीनों के सदा सहायक हैं।
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
ब्रह्मा आदि भी आपका पार नहीं पाते; शिव सदा आपका यश गाते हैं।
चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
चारों वेद गवाह हैं कि आपने सदा भक्तों की लाज रखी।
गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥
सरस्वती मन में आपके गुण गाती हैं; इंद्र भी आपका पार नहीं पाते।
नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥
जो आपका नाम लेता है, उसके जैसा धन्य कोई नहीं।
राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
राम नाम अपरंपार है, जिसे चारों वेद पुकारते हैं।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों॥
गणपति ने आपका नाम लिया, तो आपने उन्हें प्रथम पूज्य बना दिया।
शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥
शेषनाग रोज़ आपका नाम रटते हैं और पृथ्वी का भार सिर पर उठाते हैं।
फूल समान रहत सो भारा। पावत कोउ न तुम्हरो पारा॥
आपके नाम से वह भार फूल जैसा हल्का रहता है; आपका पार कोई नहीं पाता।
भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुँ न रण में हारो॥
भरत ने आपका नाम हृदय में धारण किया, इसलिए वे कभी युद्ध में नहीं हारे।
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
शत्रुघ्न के हृदय में आपका नाम प्रकाशित है; स्मरण से शत्रुओं का नाश होता है।
लषन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥
लक्ष्मण आपके आज्ञाकारी हैं और सदा संतों की रखवाली करते हैं।
ताते रण जीते नहिं कोई। युद्ध जुरे यमहूँ किन होई॥
इसलिए युद्ध में उन्हें कोई नहीं जीत सकता, चाहे सामने यमराज ही क्यों न हों।
महा लक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥
महालक्ष्मी (सीता रूप में) अवतार लेकर हर तरह से पापों को राख कर देती हैं।
सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
सीता-राम का पवित्र यश गाया गया; भुवनेश्वरी (सीता) ने अपना प्रभाव दिखाया।
घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥
वे (भूमि में दबे) घड़े से प्रकट हुईं, जिन्हें देखकर चंद्रमा भी लजा जाए।
सो तुमरे नित पांव पलोटत। नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
वे रोज़ आपके चरण दबाती हैं और नौ निधियाँ आपके चरणों में लोटती हैं।
सिद्धि अठारह मंगल कारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥
मंगल करने वाली अठारह सिद्धियाँ आप पर बलिहारी जाती हैं।
औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
और भी जितनी प्रभुता है, हे सीतापति, वह सब आपने ही बनाई है।
इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत न लागत पल की बारा॥
अपनी इच्छा से करोड़ों संसार रचने में आपको पल भर भी नहीं लगता।
जो तुम्हरे चरनन चित लावै। ताको मुक्ति अवसि हो जावै॥
जो आपके चरणों में मन लगाता है, उसकी मुक्ति अवश्य होती है।
सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥
हे राम, सुनिए — आप हमारे पिता हैं; आप ही भरत-कुल (भारत) के पूज्य हैं।
तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
आप ही हमारे देव और कुलदेव हैं; आप ही गुरु और प्राणों से प्यारे हैं।
जो कुछ हो सो तुमहीं राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥
हे राजा, जो कुछ है वह आप ही हैं; हे प्रभु, आपकी जय हो, लाज रखिए।
रामा आत्मा पोषण हारे। जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
हे राम, आप आत्मा का पोषण करने वाले हैं; दशरथ के प्यारे, आपकी जय हो।
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥
हे ज्योति-स्वरूप प्रभु, आपकी जय हो; आप निर्गुण, अखंड और अनुपम ब्रह्म हैं।
सत्य सत्य जय सत्यब्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
हे सत्यव्रती स्वामी, आप सत्य हैं, सनातन हैं और सबके मन की जानते हैं।
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥
जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह निश्चय ही चारों फल पाता है।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं॥
गौरीपति शिव ने सच्ची शपथ खाकर कहा है कि आपने भक्तों को सब सिद्धियाँ दी हैं।
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जापति भूपा॥
हे ज्ञान-स्वरूप, हृदय में ज्ञान दीजिए; हे जानकीपति भूप, आपको नमस्कार।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥
आप धन्य हैं, आपका प्रताप धन्य है; आपका नाम संताप हरता है।
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥
देवताओं ने आपका सच्चा और शुद्ध यश गाया, नगाड़े और शंख बजाए।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुमहीं हो हमरे तन मन धन॥
आप सत्य हैं, सनातन हैं; आप ही हमारे तन, मन और धन हैं।
याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
जो इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है।
आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिव मेरा॥
उसका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है — मेरे शिव की यह सच्ची बात मानिए।
और आस मन में जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
जो मन में कोई और कामना रखे, वह तुलसी-दल और फूल चढ़ाए,
साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्धता पावै॥
साग-पत्ते का भोग लगाए — वह मनुष्य सारी सिद्धियाँ पाता है।
अन्त समय रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥
अंत समय में वह श्रीराम के धाम जाता है और जहाँ भी जन्म ले, हरि-भक्त कहलाता है।
श्री हरि दास कहै अरु गावै। सो वैकुण्ठ धाम को पावै॥
हरिदास कहते हैं — जो इसे कहता और गाता है, वह वैकुंठ धाम पाता है।
दोहा
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय। हरिदास हरिकृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
जो सात दिन नियम से मन लगाकर पाठ करता है, वह हरि की कृपा से अवश्य भक्ति पाता है।
राम चालीसा जो पढ़े, रामचरण चित लाय। जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
जो राम के चरणों में मन लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
श्री राम चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।


