अबिगत-गति कछु कहत न आवै — सूरदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘अबिगत-गति कछु कहत न आवै’ सूरदास की रचना है। सूरदास कहते हैं — निर्गुण (अव्यक्त) ब्रह्म की गति कहने में नहीं आती। जैसे गूँगा मीठा फल खाकर उसका स्वाद मन में ही समझता है, बता नहीं सकता। जिसका कोई रूप, रेखा, गुण नहीं, उस तक मन कैसे पहुँचे — इसलिए सूर सगुण (श्रीकृष्ण) के पद गाते हैं।
सूरदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

अबिगत-गति कछु कहत न आवै। ज्यों गूँगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै॥ परम स्वाद सबही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै। मन बानी कों अगम अगोचर, सो जानै जो पावै॥ रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु, निरालंब कित धावै। सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन पद गावै॥
भावार्थ: सूरदास कहते हैं — निर्गुण (अव्यक्त) ब्रह्म की गति कहने में नहीं आती। जैसे गूँगा मीठा फल खाकर उसका स्वाद मन में ही समझता है, बता नहीं सकता। जिसका कोई रूप, रेखा, गुण नहीं, उस तक मन कैसे पहुँचे — इसलिए सूर सगुण (श्रीकृष्ण) के पद गाते हैं।
अबिगत-गति कछु कहत न आवै — सूरदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
