विष्णु चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘नमो विष्णु भगवान खरारी’ वाली विष्णु चालीसा में भगवान विष्णु के राम, वराह, मत्स्य, कूर्म और मोहिनी अवतारों और ध्रुव-प्रह्लाद जैसे भक्तों के उद्धार का वर्णन है।
गुरुवार और एकादशी को इसका पाठ विशेष माना जाता है।

दोहा
विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूं, दीजै ज्ञान बताय॥
हे विष्णु, मन लगाकर सेवक की विनती सुनिए; मैं आपकी कीर्ति का कुछ वर्णन करूँ, मुझे ज्ञान दीजिए।
चौपाई
नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
हे भगवान विष्णु, असुरों के शत्रु, कष्ट मिटाने वाले, सारे जगत में विहार करने वाले, आपको नमस्कार।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
संसार में आपकी शक्ति प्रबल है; तीनों लोकों में आपका उजाला फैला है।
सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
आपका रूप सुंदर, चेहरा मनोहर, स्वभाव सरल और मूर्ति मोहक है।
तन पर पीतांबर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥
शरीर पर पीला वस्त्र बहुत सुंदर लगता है और वैजयंती माला मन मोह लेती है।
शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
हाथों में शंख, चक्र और गदा हैं, जिन्हें देखकर दैत्यों की सेना भाग जाती है।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
आपमें सत्य और धर्म है; काम, क्रोध, अहंकार और लोभ आपको छू भी नहीं सकते।
संतभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
आप संतों, भक्तों और सज्जनों का मन प्रसन्न करते हैं और दुष्ट असुरों का नाश करते हैं।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
आप सुख देते हैं, सब कष्ट तोड़ते हैं और दोष मिटाकर लोगों को सज्जन बनाते हैं।
पाप काट भव सिंधु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
आप पाप काटकर संसार-सागर से पार उतारते हैं और कष्ट मिटाकर भक्तों को बचाते हैं।
करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥
हे प्रभु, आप केवल भक्ति के कारण अनेक रूप धारण करते हैं।
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥
जब धरती ने गाय बनकर आपको पुकारा, तब आपने राम का रूप धारण किया।
भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥
धरती का भार उतारा, असुरों को मारा और रावण आदि का संहार किया।
आप वराह रूप बनाया। हरण्याक्ष को मार गिराया॥
आपने वराह का रूप बनाया और हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥
मछली का रूप धरकर समुद्र में (वेदों की रक्षा की) और चौदह रत्न निकलवाए।
अमिलख असुरन द्वंद मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥
जब (अमृत के लिए) असुरों ने झगड़ा मचाया, तब आपने मोहिनी रूप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥
देवताओं को अमृत पिलाया और असुरों को अपनी छवि से बहला दिया।
कूर्म रूप धर सिंधु मझाया। मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥
कछुए का रूप धरकर समुद्र-मंथन कराया और मंदराचल पर्वत तुरंत उठा लिया।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥
आपने शंकर जी को संकट से छुड़ाया और भस्मासुर को (मोहिनी) रूप दिखाया।
वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥
जब असुर ने वेदों को (समुद्र में) डुबा दिया, तब आपने उन्हें ढूँढकर निकाला।
मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥
मोहिनी बनकर उस दुष्ट (भस्मासुर) को नचाया और उसी के हाथ से उसे भस्म करवाया।
असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लडाई॥
बहुत बलशाली असुर जलंधर ने शंकर जी से युद्ध किया।
हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥
शिव के सारे प्रयास के बाद भी वह दुष्ट नहीं हारा और उसने पार्वती से छल करना चाहा।
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥
तब पार्वती जी ने आपका स्मरण किया और सारी विपत्ति की कहानी बताई।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
तब आप ज्ञानी मुनि बने और (जलंधर की पत्नी) वृंदा की सुध-बुध भुला दी।
देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
उस दानव की माया देखकर वृंदा आकर आपसे लिपट गई।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥
स्पर्श से उसका सतीत्व-धर्म टूटा, और तब शिव ने उस असुर को मार डाला।
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
आपने ध्रुव और प्रह्लाद का उद्धार किया और हिरण्यकशिपु आदि दुष्टों को मारा।
गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
आपने गणिका और अजामिल को तारा और बहुत से भक्तों को संसार-सागर से पार किया।
हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
हे सृष्टि रचने वाले हरि, कृपा करके हमारे सब संताप हर लीजिए।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
हे दीनबंधु, भक्तों का भला करने वाले, मैं आपके दर्शन पाऊँ।
चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥
हे मधुसूदन, आपका सेवक दर्शन चाहता है; अपनी दया कीजिए।
जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
मैं जप, पूजा, यज्ञ और स्तुति की सही विधि नहीं जानता।
शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
शील, दया, संतोष जैसे अच्छे गुण और व्रत का ज्ञान भी मुझे नहीं है।
करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
मैं किस विधि से आपकी पूजा करूँ? अपनी कुबुद्धि देखकर मुझे भारी दुख होता है।
करहुं प्रणाम कौन विधि सुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥
किस तरह प्रणाम करूँ, कैसे स्मरण करूँ और कैसे स्वयं को समर्पित करूँ?
सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥
देवता और मुनि सदा आपकी सेवा करते हैं और परम गति पाकर प्रसन्न रहते हैं।
दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥
आप दीन-दुखियों के सदा सहायक हैं; मुझे अपना जानकर अपना लीजिए।
पाप दोष संताप नशाओ। भव-बंधन से मुक्त कराओ॥
मेरे पाप, दोष और संताप नष्ट कीजिए और संसार के बंधन से मुक्त कीजिए।
सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥
सुख-संपत्ति देकर सुख बढ़ाइए और मुझे अपने चरणों का दास बनाइए।
निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
वेद सदा यह विनती सुनाते हैं; जो इसे पढ़ता-सुनता है, वह सुख पाता है।
विष्णु चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।


