भैरव बाबा की आरती — जय भैरव देवा, बोल और अर्थ
‘जय भैरव देवा’ भगवान भैरव की आरती है, जो रविवार, हर महीने की कालाष्टमी और भैरव अष्टमी पर गाई जाती है।

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥
हे भैरव देव, आपकी जय हो; काली और गौरी देवी भी आपकी सेवा करती हैं।
तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक। भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥
आप पापियों का उद्धार करने वाले, दुख के सागर से तारने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और भयंकर रूप धारण करने वाले हैं।
वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी। महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी॥
कुत्ता आपका वाहन है और हाथ में त्रिशूल है; हे भय हरने वाले, आपकी महिमा अपार है।
तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे। चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे॥
हे देव, आपके बिना कोई सेवा सफल नहीं होती; चौमुखा दीपक जलाकर आपके दर्शन से दुख मिट जाता है।
तेल चटकि दधि मिश्रित माषबली तेरी। कृपा कीजिये भैरव, करिए नहीं देरी॥
तेल, दही मिली उड़द का भोग आपको चढ़ता है; हे भैरव, कृपा कीजिए, देर मत कीजिए।
पाँव घुँघरू बाजत अरु डमरू डमकावत। बटुकनाथ बन बालक जन मन हरषावत॥
पैरों में घुँघरू बजते हैं और डमरू डमकता है; बटुकनाथ बालक बनकर भक्तों का मन प्रसन्न करते हैं।
बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे। कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे॥
धरणीधर कहते हैं — जो बटुक भैरव की यह आरती गाता है, वह मनचाहा फल पाता है।
भैरव बाबा की आरती का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।

