देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र — पूरा पाठ और हिंदी अर्थ
यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य का माना जाता है। हर श्लोक में भक्त माँ से कहता है कि मैंने विधि से पूजा नहीं की, फिर भी — बेटा कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती। दुर्गा पूजा या सप्तशती पाठ के अंत में इसे पढ़कर भूल-चूक की क्षमा माँगी जाती है।
नवरात्रि की पूजा और दुर्गा चालीसा के बाद — पूजा में हुई भूल-चूक के लिए।

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥
हे माँ, मैं न मंत्र जानता हूँ, न यंत्र, न स्तुति; न आवाहन, न ध्यान, न स्तुति-कथाएँ; न आपकी मुद्राएँ जानता हूँ, न रोकर पुकारना। बस इतना जानता हूँ कि आपकी शरण में आना सारे कष्ट हर लेता है।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥
पूजा-विधि न जानने से, धन न होने से, आलस से या करने में असमर्थ होने से आपके चरणों की सेवा में जो चूक हुई, उसे क्षमा कीजिए, हे सबका उद्धार करने वाली माँ — बेटा कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥
हे माँ, धरती पर आपके बहुत से सीधे-सच्चे बेटे हैं; उनमें मैं ही एक चंचल-सा बेटा हूँ। फिर भी मुझे त्याग देना आपको शोभा नहीं देता — बेटा कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता नहीं।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥
हे जगन्माता, मैंने न आपके चरणों की सेवा की, न आपको कभी ज़्यादा धन चढ़ाया; फिर भी आप मुझ पर अनुपम स्नेह करती हैं — क्योंकि बेटा कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता नहीं।
परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्॥
तरह-तरह की पूजा-विधियों से घबराकर मैंने सब देवताओं को छोड़ दिया, और अब मेरी उम्र पचासी पार हो गई। हे गणेश-जननी, अब भी आपकी कृपा न हुई, तो मैं बेसहारा किसकी शरण जाऊँ?
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥
हे अपर्णा, आपके मंत्र का एक अक्षर कान में पड़ते ही गूँगा भी शहद जैसी मीठी वाणी बोलने लगता है और कंगाल करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं के साथ निडर घूमता है — तो विधि से जप करने वाले को क्या मिलेगा, यह कौन जान सकता है!
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्॥
चिता की राख लगाने वाले, विष पीने वाले, दिगंबर, जटाधारी, गले में सर्प-माला पहने, खप्पर लिए भूतों के स्वामी पशुपति ‘जगदीश’ की पदवी पाते हैं — हे भवानी, यह आपसे विवाह का ही फल है।
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥
हे चंद्रमुखी, मुझे न मोक्ष की चाह है, न संसार के वैभव की, न ज्ञान की, न सुख की। माँ, बस इतना माँगता हूँ कि मेरा जीवन ‘मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी’ जपते हुए बीते।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रूक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥
मैंने विधि से, तरह-तरह की सामग्री से आपकी आराधना नहीं की; रूखे विचारों में डूबकर वाणी से क्या-क्या नहीं किया! फिर भी हे श्यामा, मुझ अनाथ पर आप थोड़ी भी कृपा करें, तो यह आपकी ही महानता है।
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥
हे करुणा-सागर दुर्गे, विपत्ति में डूबकर ही मैं आपको याद करता हूँ — इसे मेरी चालाकी मत समझिए; भूख-प्यास से व्याकुल बच्चे माँ को ही याद करते हैं।
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥
हे जगदंबा, इसमें आश्चर्य क्या कि आपकी पूरी करुणा मुझ पर है — अपराधों की लंबी कतार से घिरे बेटे को भी माँ कभी नहीं छोड़ती।
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु॥
मेरे जैसा पापी कोई नहीं, और आपके जैसा पाप नष्ट करने वाला कोई नहीं — यह जानकर हे महादेवी, जो उचित हो वही कीजिए।
देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।




