गणगौर की कथा
एक बार चैत्र शुक्ल तृतीया को भगवान शंकर, माता पार्वती और नारद मुनि धरती पर भ्रमण करने निकले। एक गाँव में पहुँचने पर यह ख़बर फैल गई।
गाँव की साधारण घरों की स्त्रियाँ जल्दी से थाली में हल्दी, अक्षत और जो कुछ घर में था, लेकर पूजा के लिए पहुँच गईं। उनकी सच्ची भक्ति देखकर माता पार्वती ने सारा सुहाग-जल उन पर छिड़क दिया और उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया।
कुछ देर बाद धनी घरों की स्त्रियाँ सोने-चाँदी की थालियों में तरह-तरह के पकवान लेकर आईं। शिव जी ने पूछा, ‘पार्वती, सुहाग-जल तो सारा बँट गया, इन्हें क्या दोगी?’
पार्वती जी ने कहा, ‘इन्हें मैं अपने रक्त से सुहाग दूँगी।’ उन्होंने अपनी उँगली चीरकर रक्त के छींटे उन पर डाले। जिस पर जैसे छींटे पड़े, उसे वैसा ही सौभाग्य मिला।
इसके बाद पार्वती जी ने नदी किनारे स्नान करके बालू से शिव जी की प्रतिमा बनाई, पूजा की और बालू का ही भोग लगाया। इसी याद में गणगौर पर ईसर (शिव) और गौर (पार्वती) की पूजा होती है।
गणगौर की परंपरा
राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में होली के अगले दिन से 16–18 दिन तक कुँवारी लड़कियाँ और सुहागिनें मिट्टी के ईसर-गौर की पूजा करती हैं, दूब से पानी छिड़कती हैं और ‘गोर गोर गोमती’ जैसे लोकगीत गाती हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया को धूम-धाम से गणगौर की सवारी निकलती है।
यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

