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हरतालिका तीज की कथा

‘हरत’ का अर्थ है हरण करना (ले जाना) और ‘आलिका’ का अर्थ है सखी। माता पार्वती की सखियाँ उन्हें पिता के तय किए विवाह से बचाने के लिए घने वन में ले गईं, जहाँ पार्वती जी ने बालू का शिवलिंग बनाकर निर्जल व्रत और रात भर जागरण किया। इससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

हरतालिका तीज 2027: 3 सितंबर 2027, शुक्रवार — तिथि और पूजा का समय देखें

हरतालिका तीज की कथा

हरतालिका की कथा

माता पार्वती ने बचपन से ही भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया था और हिमालय पर कठोर तप कर रही थीं। एक दिन नारद मुनि आए और राजा हिमालय से बोले कि भगवान विष्णु उनकी बेटी से विवाह करना चाहते हैं। हिमालय ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

जब पार्वती जी को यह पता चला, तो वे बहुत दुखी हुईं, क्योंकि उनका मन तो शिव जी में था। उन्होंने अपनी सखियों को अपनी व्यथा बताई।

सखियों ने उपाय सोचा और पार्वती जी को पिता से छिपाकर घने वन की एक गुफ़ा में ले गईं। सखियों द्वारा हरण किए जाने के कारण ही इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ पड़ा।

भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में पार्वती जी ने गुफ़ा में रेत (बालू) का शिवलिंग बनाया, बिना अन्न-जल के व्रत रखा और रात भर शिव जी का भजन करते हुए जागरण किया।

उनकी तपस्या से शिव जी प्रसन्न हुए, प्रकट होकर वर माँगने को कहा। पार्वती जी ने कहा, ‘आप मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें।’ शिव जी ने ‘तथास्तु’ कहा। बाद में राजा हिमालय भी पार्वती जी को ढूँढते हुए वहाँ पहुँचे और शिव जी से उनका विवाह करने को राज़ी हो गए।

व्रत के नियम

यह निर्जला व्रत है — पूरे दिन और रात पानी भी नहीं पिया जाता। रात को जागरण होता है और अगली सुबह पूजा के बाद व्रत खोला जाता है। बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है।

यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हरतालिका तीज का नाम हरतालिका क्यों है?

हरत = हरण करना, आलिका = सखी। सखियाँ पार्वती जी को वन में ले गई थीं, इसलिए यह नाम पड़ा।

हरतालिका तीज में पानी पी सकते हैं?

परंपरा में यह निर्जला व्रत है। स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार या जल के साथ भी व्रत रखा जाता है।

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