जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे — तुलसीदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे’ तुलसीदास की रचना है। विनय पत्रिका का पद — तुलसीदास कहते हैं, प्रभु, आपके चरण छोड़कर कहाँ जाऊँ? संसार में किसका नाम पतित-पावन है, किसे दीन इतने प्यारे हैं? पक्षी, पशु, शिकारी, पत्थर और पेड़ तक को आपने तारा। बाकी सब देवता भी माया के वश में हैं, इसलिए तुलसी ने आपके ही हाथों खुद को सौंप दिया है।
तुलसीदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे॥ कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे। खग, मृग, ब्याध, पषान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे॥ देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया-बिबस बिचारे। तिनके हाथ दासतुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे॥
भावार्थ: विनय पत्रिका का पद — तुलसीदास कहते हैं, प्रभु, आपके चरण छोड़कर कहाँ जाऊँ? संसार में किसका नाम पतित-पावन है, किसे दीन इतने प्यारे हैं? पक्षी, पशु, शिकारी, पत्थर और पेड़ तक को आपने तारा। बाकी सब देवता भी माया के वश में हैं, इसलिए तुलसी ने आपके ही हाथों खुद को सौंप दिया है।
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे — तुलसीदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
