राजा जीमूतवाहन की कथा
गंधर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन बहुत दयालु थे। राज-पाट छोड़कर वे वन में पिता की सेवा करने चले गए। एक दिन उन्हें एक बूढ़ी स्त्री रोती हुई मिली। पूछने पर उसने बताया, ‘मैं नाग वंश की हूँ। नागों ने गरुड़ से समझौता किया है कि रोज़ एक नाग उनके भोजन के लिए जाएगा। आज मेरे इकलौते बेटे शंखचूड़ की बारी है।’
जीमूतवाहन ने कहा, ‘माँ, रोओ मत। आज तुम्हारे बेटे की जगह मैं जाऊँगा।’ वे लाल कपड़ा ओढ़कर शिला पर लेट गए। गरुड़ आए और उन्हें पंजों में दबाकर ले उड़े।
गरुड़ ने देखा कि इस बार शिकार न डर रहा है, न रो रहा है। आश्चर्य से उन्होंने पूछा, ‘तुम कौन हो?’ जीमूतवाहन ने सारी बात बताई। उनकी दया और त्याग से गरुड़ इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें छोड़ दिया और वचन दिया कि अब से किसी नाग को नहीं खाएँगे।
यह घटना आश्विन कृष्ण अष्टमी को हुई थी। तभी से माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु के लिए इस दिन जीमूतवाहन की पूजा करती हैं।
चील और सियारिन की कथा
एक जंगल में एक पेड़ पर चील और उसके नीचे सियारिन रहती थी। दोनों ने महिलाओं को जितिया व्रत करते देखा और खुद भी व्रत रखने का निश्चय किया।
चील ने पूरे नियम से निर्जला व्रत रखा। पर सियारिन भूख सहन नहीं कर पाई और रात में चुपके से खाना खा लिया। अगले जन्म में दोनों मनुष्य बनकर बहनें हुईं। चील की सभी संतानें स्वस्थ और दीर्घायु रहीं, जबकि सियारिन की संतानें जीवित नहीं रहीं। तब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने पूरे नियम से व्रत किया।
यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

