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कजरी तीज की कथा

कजरी तीज की प्रचलित कथा एक गरीब ब्राह्मण दंपति की है। पत्नी के व्रत के लिए सत्तू लाने को ब्राह्मण ने एक साहूकार की दुकान से चना-घी-शक्कर चुपके से लिया, पर पकड़े जाने पर सच बता दिया। साहूकार ने उसकी पत्नी को अपनी बहन मानकर सत्तू और गहने देकर विदा किया।

कजरी तीज 2027: 20 अगस्त 2027, शुक्रवार — तिथि और पूजा का समय देखें

कजरी तीज की कथा

गरीब ब्राह्मण की कथा

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। भाद्रपद कृष्ण तृतीया को पत्नी ने कजरी तीज का व्रत रखा और पति से कहा, ‘आज मेरा तीज का व्रत है, पूजा के लिए चने का सत्तू ले आइए।’

ब्राह्मण के पास पैसे नहीं थे। पत्नी का व्रत अधूरा न रहे, यह सोचकर वह रात को एक साहूकार की दुकान में गया और सवा किलो चने की दाल, घी और शक्कर तौलकर सत्तू बनाने लगा। आवाज़ सुनकर नौकर जाग गए और उसे पकड़ लिया।

साहूकार के सामने ब्राह्मण ने सच-सच बताया, ‘मैं चोर नहीं हूँ। मेरी पत्नी ने तीज का व्रत रखा है और मेरे पास सत्तू लाने के पैसे नहीं थे।’

साहूकार ने उसकी तलाशी ली तो सत्तू के अलावा कुछ नहीं मिला। उसका मन पिघल गया। उसने कहा, ‘आज से तुम्हारी पत्नी मेरी धर्म की बहन है।’ उसने ब्राह्मण को सत्तू, गहने, रुपये और मेहंदी देकर सम्मान से विदा किया।

उस दिन से ब्राह्मण के दिन फिर गए। कथा के अंत में कहा जाता है — ‘जैसे कजरी माता ने ब्राह्मणी की सुनी, वैसे ही सबकी सुनें।’

पूजा की परंपरा

राजस्थान और मध्य प्रदेश में इसे सातुड़ी तीज कहते हैं। महिलाएँ दिन भर व्रत रखकर शाम को नीमड़ी माता (नीम की डाल) की पूजा करती हैं, सत्तू का भोग लगाती हैं और चाँद निकलने पर अर्घ्य देकर सत्तू खाकर व्रत खोलती हैं। उत्तर प्रदेश-बिहार में इस समय कजरी लोकगीत गाए जाते हैं।

यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कजरी तीज को सातुड़ी तीज क्यों कहते हैं?

इस दिन सत्तू (सातू) का विशेष भोग लगता है और सत्तू खाकर ही व्रत खोला जाता है।

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