प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो — सूरदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो’ सूरदास की रचना है। सूरदास प्रार्थना करते हैं — प्रभु, मेरे अवगुणों पर ध्यान मत दीजिए; आपका नाम ही समदर्शी है। जैसे पारस लोहे को सोना बना देता है, चाहे वह पूजा का हो या कसाई का, और जैसे हर नदी गंगा में मिलकर गंगा हो जाती है, वैसे ही मुझे भी अपना लीजिए।
सूरदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो। समदरसी है नाम तिहारो, चाहे तो पार करो॥ इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परो। सो दुविधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरो॥ इक नदिया इक नार कहावत, मैलो नीर भरो। जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै, गंगा नाम परो॥ तन माया ज्यौं ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरो। कै इनको निरधार कीजिये, कै प्रन जात टरो॥
भावार्थ: सूरदास प्रार्थना करते हैं — प्रभु, मेरे अवगुणों पर ध्यान मत दीजिए; आपका नाम ही समदर्शी है। जैसे पारस लोहे को सोना बना देता है, चाहे वह पूजा का हो या कसाई का, और जैसे हर नदी गंगा में मिलकर गंगा हो जाती है, वैसे ही मुझे भी अपना लीजिए।
प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो — सूरदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
