1. इंद्र और इंद्राणी
भविष्य पुराण के अनुसार देवताओं और असुरों के युद्ध में देवता हारने लगे। देवराज इंद्र चिंतित होकर गुरु बृहस्पति के पास गए। गुरु ने श्रावण पूर्णिमा को मंत्रों से अभिमंत्रित एक रक्षा सूत्र तैयार करवाया। इंद्राणी (शची) ने वह सूत्र इंद्र की कलाई पर बाँधा और इंद्र को विजय मिली। तभी से रक्षा सूत्र बाँधने की परंपरा शुरू हुई।
2. राजा बलि और माँ लक्ष्मी
वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग धरती माँगकर तीनों लोक ले लिए और बलि को पाताल भेज दिया। बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसके द्वार पर पहरेदार बनकर रहने का वचन दे दिया।
वैकुंठ में माँ लक्ष्मी अकेली रह गईं। वे एक साधारण स्त्री का रूप लेकर बलि के पास गईं और श्रावण पूर्णिमा को उसकी कलाई पर राखी बाँधी। बलि ने बहन को उपहार माँगने को कहा, तो लक्ष्मी जी ने अपने पति भगवान विष्णु को वापस माँग लिया। बलि ने वचन निभाया।
3. श्रीकृष्ण और द्रौपदी
शिशुपाल वध के समय सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की उँगली कट गई और ख़ून बहने लगा। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। श्रीकृष्ण ने उसी दिन बहन की रक्षा का वचन दिया, जिसे उन्होंने चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर निभाया।
राखी बाँधने का मंत्र
राखी बाँधते समय यह मंत्र बोला जाता है: ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥’ — अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधती हूँ; हे रक्षा सूत्र, तुम अडिग रहना।
यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

