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शरद पूर्णिमा व्रत कथा

शरद पूर्णिमा की प्रचलित कथा एक साहूकार की दो बेटियों की है। बड़ी बेटी पूर्णिमा का व्रत पूरी विधि से करती थी और छोटी अधूरा छोड़ देती थी, इसलिए छोटी की संतान जन्म लेते ही नहीं बचती थी। बड़ी बहन के पुण्य के स्पर्श से छोटी का बच्चा जी उठा, और तभी से यह व्रत पूरी श्रद्धा से करने की परंपरा है।

शरद पूर्णिमा 2026: 25 अक्टूबर 2026, रविवार — तिथि और पूजा का समय देखें

शरद पूर्णिमा व्रत कथा

साहूकार की दो बेटियों की कथा

एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी दो बेटियाँ थीं और दोनों हर पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। बड़ी बेटी व्रत पूरे नियम से करती — दिन भर उपवास, शाम को पूजा और चाँद को अर्घ्य देकर ही पारण। छोटी बेटी व्रत शुरू तो करती, पर बीच में ही भोजन कर लेती और व्रत अधूरा छोड़ देती।

दोनों का विवाह हुआ। बड़ी बेटी के घर स्वस्थ संतान हुई, पर छोटी की संतान जन्म लेते ही दम तोड़ देती। दुखी होकर उसने एक ज्ञानी पंडित से कारण पूछा। पंडित ने बताया, ‘तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरा छोड़ देती हो, इसी कारण तुम्हारी संतान नहीं बचती। अब से शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से करो।’

छोटी बेटी ने पूरी श्रद्धा से शरद पूर्णिमा का व्रत किया। कुछ समय बाद उसके घर बेटा हुआ, पर वह भी कुछ ही देर में बेसुध हो गया। उसने बच्चे को एक पीढ़े पर लिटाकर ऊपर कपड़ा ढक दिया और अपनी बड़ी बहन को बुला लाई। बैठने के लिए उसने वही पीढ़ा आगे कर दिया।

बड़ी बहन जैसे ही बैठने लगी, उसके घाघरे का किनारा बच्चे को छू गया और बच्चा रोने लगा। बड़ी बहन चौंककर बोली, ‘तू मुझे बच्चे पर बिठा रही थी? यह मर जाता तो मुझ पर कलंक लगता!’ छोटी बहन रोते हुए बोली, ‘दीदी, यह तो पहले से ही बेसुध था। तुम्हारे पुण्य के स्पर्श से ही यह जी उठा है।’

उस दिन के बाद छोटी बहन ने भी हर पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम से किया और उसका परिवार सुखी हो गया। तभी से नगर में घोषणा हुई कि सब लोग शरद पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा से करें।

कोजागरी लक्ष्मी पूजा की कथा

शरद पूर्णिमा को ‘कोजागरी पूर्णिमा’ भी कहते हैं। ‘को जागर्ति’ का अर्थ है — ‘कौन जाग रहा है?’ मान्यता है कि इस रात माँ लक्ष्मी धरती पर घूमती हैं और देखती हैं कि कौन जागकर उनका स्मरण कर रहा है।

कथा है कि एक निर्धन ब्राह्मण की पत्नी ने इस रात दीपक जलाकर, जागरण करते हुए माँ लक्ष्मी की पूजा की। आधी रात को माँ लक्ष्मी ने आकर पूछा, ‘को जागर्ति?’ — कौन जाग रहा है? जागती हुई ब्राह्मणी को देखकर वे प्रसन्न हुईं और उसका घर धन-धान्य से भर गया। इसलिए बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र और मिथिला में इस रात लक्ष्मी पूजा और जागरण होता है।

चाँदनी में खीर क्यों रखते हैं

मान्यता है कि साल में सिर्फ़ शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी सोलहों कलाओं से पूरा होता है और उसकी किरणों में अमृत बरसता है। इसलिए रात को गाय के दूध की खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे चाँदनी में रखी जाती है और अगली सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है। ब्रज में इसी रात श्रीकृष्ण के महारास की स्मृति में ‘रास पूर्णिमा’ मनाई जाती है।

पूजा विधि (सरल)

सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। शाम को माँ लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा करें, घी का दीपक जलाएँ और यह कथा सुनें।

चाँद निकलने पर जल, दूध और अक्षत से अर्घ्य दें। खीर बनाकर पहले भगवान को भोग लगाएँ, फिर उसे चाँदनी में रख दें। रात में लक्ष्मी जी का स्मरण, भजन या जागरण करें और सुबह खीर का प्रसाद सबको बाँटें।

यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शरद पूर्णिमा की कथा किसकी है?

एक साहूकार की दो बेटियों की, जिनमें बड़ी बहन पूर्णिमा का व्रत पूरा करती थी और छोटी अधूरा छोड़ देती थी।

शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा क्यों कहते हैं?

‘को जागर्ति’ यानी ‘कौन जाग रहा है’ — मान्यता है कि इस रात माँ लक्ष्मी देखती हैं कि कौन जागकर उनका स्मरण कर रहा है।

शरद पूर्णिमा पर खीर कब खाते हैं?

रात भर चाँदनी में रखी खीर अगली सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है।

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