लक्ष्मी चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास’ से शुरू होने वाली श्री लक्ष्मी चालीसा रामदास जी की रचना है। इसमें समुद्र-मंथन से लक्ष्मी के प्रकट होने और हर अवतार में विष्णु के साथ रहने का वर्णन है।
दिवाली की रात, धनतेरस और हर शुक्रवार को इसका पाठ किया जाता है — दिवाली 2026 का पूजा समय।

दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
हे माँ लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में बसिए और मेरी मनोकामना पूरी करके मेरी आशा पूरी कीजिए।
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
हाथ जोड़कर यही विनती है — हे जगत की माता, हर तरह से मेरे घर में वास कीजिए। (सोरठा)
चौपाई
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥
हे समुद्र की पुत्री, मैं आपका स्मरण करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
आपके जैसा उपकार करने वाला कोई नहीं; हर तरह से हमारी आशा पूरी कीजिए।
जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
हे जगत की जननी जगदंबा, आपकी जय हो; आप ही सबका सहारा हैं।
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
आप हर हृदय में बसती हैं; हमारी यही खास विनती है।
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
हे जगजननी, समुद्र की पुत्री, आपकी जय हो; आप दीन-दुखियों का भला करती हैं।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
हे महारानी, मैं रोज़ आपसे विनती करता हूँ; हे जगजननी भवानी, कृपा कीजिए।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
मैं किस तरह आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुध लीजिए।
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
मेरी ओर कृपा-दृष्टि से देखिए; हे जगजननी, मेरी विनती सुनिए।
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
हे ज्ञान, बुद्धि और सुख देने वाली माँ, आपकी जय हो; हमारे संकट हर लीजिए।
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
जब विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन करवाया, तब समुद्र से चौदह रत्न निकले।
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
उन चौदह रत्नों में आप सुख की खान बनकर निकलीं और प्रभु की सेविका बनकर उनकी सेवा की।
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
प्रभु ने जब-जब जहाँ जन्म लिया, आपने रूप बदलकर वहीं उनकी सेवा की।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य शरीर धारण किया और अयोध्या में (राम रूप में) अवतार लिया,
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
तब आप जनकपुर में (सीता रूप में) प्रकट हुईं और प्रसन्न मन से उनकी सेवा की।
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
अंतर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया; आप तीनों लोकों की स्वामिनी के रूप में विश्व-प्रसिद्ध हैं।
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
आपके जैसी प्रबल शक्ति कोई दूसरी नहीं; मैं आपकी महिमा का कहाँ तक बखान करूँ।
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥
जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
छल-कपट और चालाकी छोड़कर, मन लगाकर तरह-तरह से आपकी पूजा करे।
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥
और मैं समझाकर बताता हूँ — जो मन लगाकर यह पाठ करता है,
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है।
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
हे दुख दूर करने वाली, रक्षा करो, रक्षा करो! आप तीनों तरह के कष्ट और संसार के बंधन हरती हैं।
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
जो यह चालीसा पढ़ता-पढ़ाता है और ध्यान से सुनता-सुनाता है,
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
उसे कोई रोग नहीं सताता और वह संतान, धन और संपत्ति पाता है।
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
जो संतानहीन हो, धनहीन हो, अंधा, बहरा, रोगी या बहुत दीन हो,
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
वह ब्राह्मण को बुलाकर यह पाठ करवाए और मन में कभी शंका न लाए।
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
जो चालीस दिन यह पाठ करवाता है, उस पर गौरीपति शिव भी कृपा करते हैं।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
वह बहुत सुख-संपत्ति पाता है और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
जो बारहों महीने पूजा करता है, उसके जैसा धन्य कोई दूसरा नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
जो रोज़ मन में यह पाठ करता है, उसके जैसा संसार में कोई नहीं।
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
मैं कितनी बड़ाई करूँ — ध्यान लगाकर खुद परख लीजिए।
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
विश्वास के साथ नियम से व्रत करने पर काम सिद्ध होते हैं और हृदय में प्रेम उपजता है।
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
हे लक्ष्मी भवानी, आपकी जय हो; हे गुणों की खान, आप सब में व्याप्त हैं।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
संसार में आपका तेज प्रबल है; आपके जैसा दयालु कहीं कोई नहीं।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
मुझ अनाथ की अब सुध लीजिए; संकट काटकर मुझे अपनी भक्ति दीजिए।
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
हमारी भूल-चूक क्षमा कीजिए और हमारी दशा देखकर दर्शन दीजिए।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
आपके दर्शन बिना भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी वह भारी दुख सह रहा है।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
मुझमें न ज्ञान है न बुद्धि; आप अपने मन में सब जानती हैं।
रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
चार भुजाओं वाला रूप धारण करके अब मेरे कष्ट दूर कीजिए।
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
मैं किस तरह आपकी बड़ाई करूँ, मेरे पास इतना ज्ञान और बुद्धि नहीं।
दोहा
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
हे दुख हरने वाली, रक्षा कीजिए, जल्दी सारे डर दूर कीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो; शत्रुओं का नाश कीजिए।
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
रामदास रोज़ ध्यान करके हाथ जोड़कर विनती करते हैं — हे माँ लक्ष्मी, इस दास पर थोड़ी दया कीजिए।
लक्ष्मी चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।


