अर्गला स्तोत्र — पूरा पाठ और हिंदी अर्थ
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले पढ़ा जाता है (कवच, अर्गला, कीलक)। इसमें मार्कंडेय ऋषि देवी के अलग-अलग रूपों को नमस्कार करते हुए हर श्लोक में माँगते हैं — रूप दो, जय दो, यश दो, शत्रुओं को नष्ट करो।
नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती से पहले — साथ में सप्तश्लोकी दुर्गा और दुर्गा मंत्र।

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
हे जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा — आपको नमस्कार।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥
हे चामुंडा देवी, आपकी जय हो; प्राणियों का दुःख हरने वाली, आपकी जय हो; हे सर्वव्यापिनी कालरात्रि, आपको नमस्कार।
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मधु-कैटभ को भगाने वाली और ब्रह्मा को वर देने वाली देवी को नमस्कार। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो। (यही टेक आगे हर श्लोक में है।)
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
महिषासुर का नाश करने वाली, भक्तों को सुख देने वाली, आपको नमस्कार। रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे रक्तबीज का वध करने वाली, चंड-मुंड का नाश करने वाली देवी — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
शुंभ, निशुंभ और धूम्राक्ष का मर्दन करने वाली — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
जिनके दोनों चरण सबके द्वारा वंदित हैं, सब सौभाग्य देने वाली देवी — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
जिनका रूप और चरित्र सोच से परे है, सारे शत्रुओं का नाश करने वाली — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे चंडिके, भक्ति से झुकने वालों के पाप सदा हरने वाली — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे चंडिके, भक्ति से स्तुति करने वालों के रोग नष्ट करने वाली — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे चंडिके, जो यहाँ सदा भक्ति से आपकी पूजा करते हैं, उन्हें रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
मुझे सौभाग्य, आरोग्य और परम सुख दो; रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
शत्रुओं का नाश करो और मुझे बहुत बल दो; रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे देवी, कल्याण करो और परम लक्ष्मी दो; रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे अंबिके, जिनके चरणों पर देवताओं और असुरों के मुकुट-रत्न घिसते हैं — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अपने भक्त को विद्वान, यशस्वी और धनवान बनाओ; रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
प्रचंड दैत्यों का घमंड तोड़ने वाली चंडिके, मुझ शरणागत को रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे चार भुजाओं वाली, चार मुख वाले ब्रह्मा द्वारा स्तुत परमेश्वरी — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे अंबिके, भगवान कृष्ण ने भी सदा भक्ति से जिनकी स्तुति की — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिमालय-पुत्री के स्वामी शिव द्वारा स्तुत परमेश्वरी — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
इंद्राणी के पति इंद्र द्वारा सच्चे भाव से पूजी गई परमेश्वरी — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे देवी, प्रचंड भुजाओं वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हे अंबिके, भक्तों को भरपूर आनंद देने वाली — रूप, जय, यश दो; शत्रुओं को नष्ट करो।
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
मन के अनुकूल चलने वाली, सुंदर, अच्छे कुल की और कठिन संसार-सागर से पार कराने वाली जीवनसंगिनी दो।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥
जो इस स्तोत्र को पढ़कर फिर महास्तोत्र (दुर्गा सप्तशती) पढ़ता है, वह सप्तशती के जप जितना श्रेष्ठ फल और संपदा पाता है।
अर्गला स्तोत्र का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।




