बजरंग बाण — पूरे बोल और अर्थ
बजरंग बाण गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना मानी जाती है। इसमें 2 दोहे और 32 चौपाइयाँ हैं, जिनमें हनुमान जी से संकट, भय और बाधा दूर करने की प्रार्थना है।
मंगलवार और शनिवार को, हनुमान चालीसा के बाद — साथ में हनुमान चालीसा और संकटमोचन हनुमानाष्टक।

दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
जो दृढ़ निश्चय, प्रेम और विश्वास के साथ विनय और सम्मान से प्रार्थना करते हैं, हनुमान जी उनके सारे शुभ काम सिद्ध कर देते हैं।
चौपाई
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
संतों का हित करने वाले हनुमान जी, आपकी जय हो। हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
अपने भक्त के काम में देर न कीजिए; जल्दी दौड़कर आइए और बड़ा सुख दीजिए।
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
जैसे आप कूदकर समुद्र के पार गए और सुरसा के फैले हुए मुँह में घुसकर (बाहर निकल आए)।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
आगे लंकिनी ने रोका तो आपने उसे लात मारी और वह सुरलोक चली गई।
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
आपने विभीषण को सुख दिया और माता सीता के दर्शन करके परम आनंद पाया।
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अशोक वाटिका उजाड़कर (राक्षसों को) समुद्र में डुबो दिया और बड़ी तेज़ी से यमराज जैसे भयानक योद्धाओं को तोड़ डाला।
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
रावण के पुत्र अक्षय कुमार का संहार किया और पूँछ लपेटकर लंका जला दी।
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
लंका लाख की तरह जल गई और देवलोक तथा आकाश में जय-जयकार गूँज उठी।
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
हे स्वामी, अब किस कारण देर कर रहे हैं? हे हृदय की बात जानने वाले, कृपा कीजिए।
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
लक्ष्मण जी को प्राण देने वाले (संजीवनी लाने वाले) आपकी जय हो; जल्दी आकर दुख का नाश कीजिए।
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
बल के सागर हनुमान जी की जय; आप देवताओं के समूह में समर्थ और श्रेष्ठ योद्धा हैं।
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
हे हठीले हनुमान, शत्रु को वज्र की कील से मारिए। (यहाँ ‘हनु’ का अर्थ है — नष्ट करो।)
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
हे कपियों के स्वामी हनुमान (बीज मंत्रों से आवाहन) — शत्रु के हृदय और सिर पर प्रहार कीजिए।
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बलवान अंजनी-पुत्र की जय; आप शंकर के अवतार, वीर हनुमान हैं।
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
आपका रूप विकराल है, आप काल के कुल का भी नाश करने वाले हैं; आप श्रीराम के सहायक और सदा रक्षा करने वाले हैं।
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि-बेताल और महामारी जैसे संकट —
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
— इन सबको नष्ट कीजिए, आपको श्रीराम की शपथ है; हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखिए।
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
श्रीहरि की शपथ पाकर (अपना वचन) सत्य कीजिए; हे रामदूत, दौड़कर (संकट को) पकड़िए और मारिए।
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
अथाह शक्ति वाले हनुमान जी की जय हो; आपका भक्त किस अपराध से दुख पा रहा है?
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
आपका यह दास पूजा, जप, तप, नियम और आचार — कुछ भी नहीं जानता।
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
वन में, बाग में, रास्ते में, पहाड़ पर या घर में — आपके बल के भरोसे मैं कहीं नहीं डरता।
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
आप जानकी और श्रीहरि के दास कहलाते हैं; उनकी शपथ है, देर न कीजिए।
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
आकाश में जय-जय की ध्वनि हो रही है; आपका स्मरण करते ही असहनीय दुख नष्ट हो जाता है।
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
आपके चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ; इस संकट की घड़ी में आपके सिवा और किसे पुकारूँ?
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
उठिए, उठिए, चलिए — आपको श्रीराम की दुहाई है; मैं पैरों पड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ।
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
हे चंचल, तेज़ चलने वाले हनुमान (बीज मंत्रों से आवाहन) — संकट का नाश कीजिए।
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
चंचल कपि जब हुंकार भरते हैं, तो दुष्टों का दल सहमकर भाग जाता है।
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
अपने भक्त को तुरंत उबार लीजिए; आपका स्मरण करते ही हमें आनंद मिलता है।
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
यह बजरंग बाण जिस (संकट) पर चलता है, बताइए फिर उसे कौन बचा सकता है?
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
जो इस बजरंग बाण का जाप करता है, उससे सारे भूत-प्रेत काँपते हैं।
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥
जो धूप जलाकर सदा इसका जाप करता है, उसके शरीर में कोई कष्ट नहीं रहता।
दोहा
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥
जो हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण में आकर, ध्यान लगाकर पाठ करता है — हनुमान जी उसकी सारी बाधाएँ हर लेते हैं और सब काम सफल करते हैं।
बजरंग बाण का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।

