दामोदराष्टकम् — पूरा पाठ और हिंदी अर्थ
दामोदराष्टकम् पद्म पुराण से है और सत्यव्रत मुनि की रचना माना जाता है। इसमें यशोदा माँ द्वारा ओखली से बाँधे गए बाल-कृष्ण (दामोदर) की लीला है और भक्त मोक्ष नहीं, बस प्रेम-भक्ति माँगता है।
पूरे कार्तिक मास में, शाम को दीपक जलाकर — कार्तिक पूर्णिमा तक।

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्। यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या॥
सत्-चित्-आनंद रूप, चमकते कुंडलों वाले, गोकुल में शोभायमान उन ईश्वर को नमस्कार — जो यशोदा के डर से ओखली से कूदकर भागे और जिन्हें गोपी (यशोदा) ने दौड़कर पीछे से पकड़ लिया।
रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं कराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम्। मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्ककण्ठ- स्थितग्रैवदामोदरं भक्तिबद्धम्॥
माँ की छड़ी देखकर रोते हुए, कमल जैसे हाथों से बार-बार आँखें मलते, डरी आँखों वाले, सिसकियों से जिनका तीन रेखाओं वाला कंठ काँप रहा है — भक्ति (प्रेम) की रस्सी से बँधे उन दामोदर को नमस्कार।
इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्। तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे॥
ऐसी बाल-लीलाओं से जो पूरे गोकुल को आनंद के कुंड में डुबो देते हैं, और यह दिखाते हैं कि वे ऐश्वर्य जानने वालों से नहीं, प्रेमी भक्तों से जीते जाते हैं — उन्हें मैं प्रेम से सौ बार वंदन करता हूँ।
वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह। इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥
हे देव, आप सब वर दे सकते हैं, फिर भी मैं न मोक्ष माँगता हूँ, न वैकुंठ, न कोई और वर। हे नाथ, बस आपका यह बाल-गोपाल रूप सदा मेरे मन में प्रकट रहे — और किसी चीज़ से क्या काम!
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै- र्वृतं कुन्तलैः स्निग्धरक्तैश्च गोप्या। मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मे मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः॥
घुँघराले काले बालों से घिरा आपका कमल-मुख, जिसे माँ यशोदा बार-बार चूमती हैं, और बिंबफल जैसे लाल होंठ — यही मेरे मन में बसे रहें; लाखों दूसरे लाभों की मुझे ज़रूरत नहीं।
नमो देव दामोदरानन्त विष्णो प्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम्। कृपादृष्टिवृष्ट्यातिदीनं बतानु- गृहाणेश मामज्ञमेध्यक्षिदृश्यः॥
हे देव, दामोदर, अनंत, विष्णु, आपको नमस्कार। हे प्रभो, दुःखों के जाल वाले सागर में डूबे मुझ पर प्रसन्न होइए; इस अति दीन, अज्ञानी पर कृपा-दृष्टि की वर्षा कीजिए और मेरी आँखों के सामने प्रकट होइए।
कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत् त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च। तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥
जैसे ओखली से बँधे रहकर ही आपने कुबेर के दोनों पुत्रों (यमलार्जुन वृक्ष) को मुक्त किया और भक्त बना दिया, वैसे ही मुझे अपनी प्रेम-भक्ति दीजिए; हे दामोदर, मुझे मोक्ष का कोई आग्रह नहीं।
नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्दीप्तिधाम्ने त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने। नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम्॥
आपके पेट पर बँधी उस चमकती रस्सी को नमस्कार, और पूरे विश्व को धारण करने वाले आपके उदर को नमस्कार; आपकी प्रिया श्री राधिका को नमस्कार, और अनंत लीलाओं वाले आप भगवान को नमस्कार।
दामोदराष्टकम् का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।


