घूँघट का पट खोल रे — कबीरदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘घूँघट का पट खोल रे’ कबीरदास की रचना है। कबीर आत्मा से कहते हैं — अज्ञान का घूँघट खोल, तुझे प्रियतम (परमात्मा) मिलेंगे। वह हर घट (हृदय) में रमता है, इसलिए किसी से कड़वा मत बोल। धन-जवानी का घमंड मत कर; मन के शून्य महल में ज्ञान का दीपक जला — तब भीतर अनहद नाद बजेगा और आनंद मिलेगा।
कबीरदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

घूँघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे। घट घट में वह साँई रमता, कटुक बचन मत बोल रे॥ धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरँग चोल रे। सुन्न महल में दियना बारि ले, आसा सों मत डोल रे॥ जोग जुगत सों रंगमहल में, पिय पायो अनमोल रे। कहैं कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे॥
भावार्थ: कबीर आत्मा से कहते हैं — अज्ञान का घूँघट खोल, तुझे प्रियतम (परमात्मा) मिलेंगे। वह हर घट (हृदय) में रमता है, इसलिए किसी से कड़वा मत बोल। धन-जवानी का घमंड मत कर; मन के शून्य महल में ज्ञान का दीपक जला — तब भीतर अनहद नाद बजेगा और आनंद मिलेगा।
घूँघट का पट खोल रे — कबीरदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
