झीनी झीनी बीनी चदरिया — कबीरदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ कबीरदास की रचना है। कबीर शरीर को एक बारीक बुनी चादर बताते हैं, जिसे राम-नाम के ताने-बाने से बुना गया है। सुर, नर, मुनि सबने इसे ओढ़कर मैली कर दी, पर दास कबीर ने इसे बड़े जतन से ओढ़ा और जैसी मिली थी, वैसी ही ज्यों की त्यों लौटा दी — यानी जीवन को पवित्र रखा।
कबीरदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

झीनी झीनी बीनी चदरिया। काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया॥ इंगला पिंगला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया। आठ कँवल दल चरखा डोलै, पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया॥ साँई को सियत मास दस लागै, ठोक ठोक कै बीनी चदरिया। सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी, ओढ़ि कै मैली कीनी चदरिया॥ दास कबीर जतन करि ओढ़ी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया॥
भावार्थ: कबीर शरीर को एक बारीक बुनी चादर बताते हैं, जिसे राम-नाम के ताने-बाने से बुना गया है। सुर, नर, मुनि सबने इसे ओढ़कर मैली कर दी, पर दास कबीर ने इसे बड़े जतन से ओढ़ा और जैसी मिली थी, वैसी ही ज्यों की त्यों लौटा दी — यानी जीवन को पवित्र रखा।
झीनी झीनी बीनी चदरिया — कबीरदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
