मन रे परसि हरि के चरण — मीराबाई — पूरे बोल और भावार्थ
‘मन रे परसि हरि के चरण’ मीराबाई की रचना है। मीरा अपने मन से कहती हैं — हरि के चरणों को छू ले। ये वही चरण हैं जिन्होंने प्रह्लाद और ध्रुव को अटल पद दिया, अहिल्या को तारा, कालिया नाग को नाथा और गोवर्धन उठाकर इंद्र का घमंड तोड़ा। ये चरण संसार के तीनों तापों को हरने वाले हैं।
मीराबाई की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

मन रे परसि हरि के चरण। सुभग सीतल कमल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरण॥ जो चरण प्रह्लाद परसे, इंद्र पदवी धरण। जिन चरण ध्रुव अटल कीन्हें, राखि अपनी सरण॥ जिन चरण ब्रह्मांड भेट्यो, नखसिखाँ सिरी धरण। जिन चरण प्रभु परसि लीन्हें, तरी गोतम घरण॥ जिन चरण कालीनाग नाथ्यो, गोप लीला करण। जिन चरण गोबरधन धार्यो, गर्व मघवा हरण॥ दासि मीरा लाल गिरधर, अगम तारण तरण॥
भावार्थ: मीरा अपने मन से कहती हैं — हरि के चरणों को छू ले। ये वही चरण हैं जिन्होंने प्रह्लाद और ध्रुव को अटल पद दिया, अहिल्या को तारा, कालिया नाग को नाथा और गोवर्धन उठाकर इंद्र का घमंड तोड़ा। ये चरण संसार के तीनों तापों को हरने वाले हैं।
मन रे परसि हरि के चरण — मीराबाई का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
