नरकासुर वध की कथा
प्राग्ज्योतिषपुर (आज का असम) में नरकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर राजा था। वरदान के घमंड में उसने देवताओं को हराया, देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए और 16,100 राजकन्याओं को बंदी बना लिया।
दुखी देवता इंद्र के साथ श्रीकृष्ण के पास पहुँचे। नरकासुर को वरदान था कि वह किसी स्त्री के हाथों ही मरेगा, इसलिए श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर गए।
भयंकर युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र और सत्यभामा के बाणों से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर मारा गया। मरते समय उसने वर माँगा कि इस दिन लोग खुशी से दीप जलाएँ और मंगल-स्नान करें।
श्रीकृष्ण ने बंदी कन्याओं को मुक्त किया और अदिति के कुंडल लौटाए। समाज में उन कन्याओं का सम्मान बना रहे, इसलिए श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा दिया।
राजा रंतिदेव की कथा
रंतिदेव नाम के एक बहुत दानी और धर्मात्मा राजा थे। जब उनकी मृत्यु का समय आया, तो यमदूत उन्हें लेने आए। राजा ने पूछा, ‘मैंने कभी जान-बूझकर पाप नहीं किया, फिर मुझे नरक क्यों ले जाया जा रहा है?’
यमदूतों ने बताया कि एक बार उनके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण बिना भोजन लौट गया था। राजा ने एक वर्ष का समय माँगा। ऋषियों की सलाह पर उन्होंने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत रखा और ब्राह्मणों को भोजन कराकर क्षमा माँगी। इस पुण्य से वे नरक से बच गए। तभी से यह दिन ‘नरक चतुर्दशी’ कहलाया।
इस दिन क्या करते हैं
सूर्योदय से पहले तिल का तेल लगाकर, उबटन से अभ्यंग स्नान किया जाता है। इसी से इसे ‘रूप चौदस’ भी कहते हैं। शाम को घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है और घर में दीप सजाए जाते हैं। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में इसी दिन मुख्य दीपावली मनाई जाती है, और कई जगह हनुमान जयंती भी इसी तिथि को मनाई जाती है।
यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।


