श्री पितर चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
श्री पितर चालीसा पितरों (परिवार के दिवंगत पूर्वजों) की स्तुति है, जिसका पाठ पितृ पक्ष, श्राद्ध और अमावस्या पर किया जाता है। यह चालीसा राजस्थान के झुंझुनू के पितर-धाम की परंपरा से जुड़ी है और इसमें पितृ-ऋण, तर्पण और नांदीमुख श्राद्ध का उल्लेख है।
पितृ पक्ष और हर अमावस्या पर — देखें पितृ पक्ष कब है और सर्व पितृ अमावस्या।

दोहा
हे पितरेश्वर आपको, दे दियो आशीर्वाद। चरणाशीश नवा दियो, रखदो सिर पर हाथ॥
हे पितरेश्वर, हमें आशीर्वाद दीजिए। हमने आपके चरणों में सिर झुकाया है — हमारे सिर पर हाथ रख दीजिए।
सबसे पहले गणपत, पाछे घर का देव मनावा जी। हे पितरेश्वर दया राखियो, करियो मन की चाया जी॥
सबसे पहले गणपति को, फिर घर के देवता को मनाते हैं। हे पितरेश्वर, दया बनाए रखना और मन की इच्छा पूरी करना।
चौपाई
पितरेश्वर करो मार्ग उजागर। चरण रज की मुक्ति सागर॥
हे पितरेश्वर, हमारा रास्ता रोशन कीजिए; आपके चरणों की धूल मुक्ति का सागर है।
परम उपकार पितरेश्वर कीन्हा। मनुष्य योनि में जन्म दीन्हा॥
पितरों ने हम पर सबसे बड़ा उपकार किया — हमें मनुष्य के रूप में जन्म दिया।
मातृ-पितृ देव मन जो भावे। सोई अमित जीवन फल पावे॥
जिसके मन को माता-पिता रूपी देव भाते हैं, वही जीवन का असीम फल पाता है।
जै जै जै पित्तर जी साईं। पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं॥
हे स्वामी पितर जी, आपकी जय हो! पितृ-ऋण चुकाए बिना मुक्ति नहीं मिलती।
चारों ओर प्रताप तुम्हारा। संकट में तेरा ही सहारा॥
चारों ओर आपका प्रताप फैला है; संकट में आपका ही सहारा है।
नारायण आधार सृष्टि का। पित्तर जी अंश उसी दृष्टि का॥
भगवान नारायण सृष्टि के आधार हैं, और पितर उन्हीं की दृष्टि के अंश हैं।
प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते। भाग्य द्वार आप ही खुलवाते॥
प्रभु की आज्ञा है कि पहले पितरों का पूजन हो; भाग्य के दरवाज़े आप ही खुलवाते हैं।
झुंझुनू में दरबार है साजे। सब देवों संग आप विराजे॥
झुंझुनू (राजस्थान) में आपका दरबार सजा है, जहाँ आप सब देवताओं के साथ विराजते हैं।
प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा। कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा॥
प्रसन्न होने पर आप मनचाहा फल देते हैं, और नाराज़ होने पर बुद्धि हर लेते हैं।
पित्तर महिमा सबसे न्यारी। जिसका गुण गावे नर नारी॥
पितरों की महिमा सबसे निराली है, जिसका गुण सभी स्त्री-पुरुष गाते हैं।
तीन मण्ड में आप बिराजे। बसु रुद्र आदित्य में साजे॥
आप तीनों मंडलों में विराजते हैं — वसु, रुद्र और आदित्य रूप में (श्राद्ध में पिता, दादा और परदादा इन्हीं रूपों में पूजे जाते हैं)।
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवक समेत सुत नारी॥
हे नाथ, सारी संपत्ति आपकी ही दी हुई है; मैं अपने बेटे और पत्नी सहित आपका सेवक हूँ।
छप्पन भोग नहीं हैं भाते। शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते॥
आपको छप्पन भोग नहीं चाहिए; आप तो शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते हैं।
तुम्हारे भजन परम हितकारी। छोटे बड़े सभी अधिकारी॥
आपका भजन सबसे हितकारी है, और छोटे-बड़े सभी इसके अधिकारी हैं।
भानु उदय संग आप पुजावै। पांच अँजुलि जल रिझावे॥
सूर्योदय के साथ आपकी पूजा होती है; पाँच अंजलि जल (तर्पण) से आप प्रसन्न हो जाते हैं।
ध्वज पताका मण्ड पे है साजे। अखण्ड ज्योति में आप विराजे॥
आपके मंडप पर ध्वजा-पताका सजी है और आप अखंड ज्योति में विराजते हैं।
सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी। धन्य हुई जन्म भूमि हमारी॥
आपकी ज्योति सदियों पुरानी है, जिससे हमारी जन्मभूमि धन्य हो गई।
शहीद हमारे यहाँ पुजाते। मातृ भक्ति संदेश सुनाते॥
हमारे यहाँ शहीद भी पूजे जाते हैं, जो मातृभूमि की भक्ति का संदेश देते हैं।
जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा। धर्म जाति का नहीं है नारा॥
पूरे जगत के पितरों का सम्मान हमारा सिद्धांत है; इसमें धर्म या जाति का भेद नहीं।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई। सब पूजे पित्तर भाई॥
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई — सभी अपने पूर्वजों को पूजते हैं।
हिन्दू वंश वृक्ष है हमारा। जान से ज्यादा हमको प्यारा॥
हमारा वंश-वृक्ष हमें जान से भी ज़्यादा प्यारा है।
गंगा ये मरुप्रदेश की। पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की॥
यह (पितरों की धारा) मरुभूमि की गंगा है; यहाँ के परिवेश में पितृ-तर्पण आवश्यक माना जाता है।
बन्धु छोड़ ना इनके चरणाँ। इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा॥
हे भाई, इनके चरण कभी मत छोड़ना; इन्हीं की कृपा से प्रभु की शरण मिलती है।
चौदस को जागरण करवाते। अमावस को हम धोक लगाते॥
चतुर्दशी को जागरण करवाते हैं और अमावस्या को माथा टेककर प्रणाम (धोक) करते हैं।
जात जडूला सभी मनाते। नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते॥
सब जात-जडूला (बच्चे का पहला मुंडन) मनाते हैं और शुभ कामों से पहले नांदीमुख श्राद्ध करवाते हैं।
धन्य जन्म भूमि का वो फूल है। जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है॥
जन्मभूमि का वह फूल धन्य है, जिसे पितृ-मंडल की धूल मिली है।
श्री पित्तर जी भक्त हितकारी। सुन लीजे प्रभु अरज हमारी॥
हे भक्तों का भला करने वाले पितर जी, हमारी प्रार्थना सुन लीजिए।
निशदिन ध्यान धरे जो कोई। ता सम भक्त और नहीं कोई॥
जो दिन-रात आपका ध्यान करता है, उसके समान कोई दूसरा भक्त नहीं।
तुम अनाथ के नाथ सहाई। दीनन के हो तुम सदा सहाई॥
आप अनाथों के नाथ और सहायक हैं; आप सदा दीनों की मदद करते हैं।
चारिक वेद प्रभु के साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
चारों वेद इसके साक्षी हैं कि आपने सदा भक्तों की लाज रखी है।
नाम तुम्हारो लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहीं कोई॥
जो आपका नाम लेता है, उसके समान धन्य कोई नहीं।
जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत। नवों सिद्धि चरणा में लोटत॥
जो रोज़ आपके पाँव दबाता (सेवा करता) है, नौ सिद्धियाँ उसके चरणों में लोटती हैं।
सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी। जो तुम पे जावे बलिहारी॥
आपकी दी हुई सिद्धियाँ सब मंगल करती हैं, उसके लिए जो आप पर न्योछावर हो जाए।
जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे। ताकी मुक्ति अवसी हो जावे॥
जो आपके चरणों में मन लगाता है, उसकी मुक्ति अवश्य हो जाती है।
सत्य भजन तुम्हारो जो गावे। सो निश्चय चारों फल पावे॥
जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह निश्चय ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चारों फल पाता है।
तुमहिं देव कुलदेव हमारे। तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे॥
आप ही हमारे देव और कुलदेव हैं; आप ही प्राणों से प्यारे गुरुदेव हैं।
सत्य आस मन में जो होई। मनवांछित फल पावें सोई॥
जिसके मन में सच्ची आस होती है, वही मनचाहा फल पाता है।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस्र मुख सके न गाई॥
आपकी महिमा और बड़ाई इतनी है कि हज़ार मुख वाले शेषनाग भी उसे गा नहीं सकते।
मैं अतिदीन मलीन दुखारी। करहु कौन विधि विनय तुम्हारी॥
मैं बहुत दीन, मैला और दुखी हूँ; किस विधि से आपकी विनती करूँ?
अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥
हे पितर जी, अब इस दीन पर दया कीजिए और अपनी भक्ति और शक्ति का कुछ अंश दीजिए।
दोहा
पित्तरौं को स्थान दो, तीरथ और स्वयं ग्राम। श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां, पूरण हो सब काम॥
पितरों को तीर्थ में और अपने गाँव में स्थान दो; वहाँ श्रद्धा के फूल चढ़ें तो सब काम पूरे होते हैं।
झुंझुनू धाम विराजे हैं, पित्तर हमारे महान। दर्शन से जीवन सफल हो, पूजे सकल जहान॥
हमारे महान पितर झुंझुनू धाम में विराजते हैं; उनके दर्शन से जीवन सफल होता है और सारा संसार उन्हें पूजता है।
जीवन सफल जो चाहिए, चले झुंझुनू धाम। पित्तर चरण की धूल ले, हो जीवन सफल महान॥
जो जीवन सफल बनाना चाहे, वह झुंझुनू धाम जाए; पितरों के चरणों की धूल लेकर जीवन महान और सफल होता है।
श्री पितर चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
