राधा चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘जय वृषभानु कुँवरि श्री श्यामा, कीरति नंदिनी शोभा धामा’ वाली राधा चालीसा में श्री राधा के रूप, रास-लीला और इस भाव का वर्णन है कि राधा नाम के बिना श्याम नहीं मिलते।
राधा अष्टमी (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) और हर दिन कृष्ण-भजन के साथ — आरती कुंजबिहारी की।

दोहा
श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार। वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रनवौं बारम्बार॥
हे वृषभानु की पुत्री श्री राधे, भक्तों के प्राणों का आधार, वृंदावन में विहार करने वाली — आपको बार-बार प्रणाम।
जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम। चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम॥
हे कृष्ण-प्रिया, सुख की धाम, मैं जैसा-तैसा भी हूँ, आपका हूँ; अपने सुंदर, सुख देने वाले चरणों की शरण दीजिए।
चौपाई
जय वृषभानु कुँवरि श्री श्यामा। कीरति नंदिनी शोभा धामा॥
हे वृषभानु की राजकुमारी, श्यामा, कीर्ति माँ की बेटी, शोभा की धाम, आपकी जय हो।
नित्य विहारिनि श्याम अधारा। अमित मोद मंगल दातारा॥
आप सदा (श्याम के साथ) विहार करती हैं, श्याम का आधार हैं; अपार आनंद और मंगल देती हैं।
रास विलासिनि रस विस्तारिनि। सहचरि सुभग यूथ मन भावनि॥
रास में आनंद करने वाली, प्रेम-रस फैलाने वाली, सुंदर सखियों के समूह को भाने वाली हैं आप।
नित्य किशोरी राधा गोरी। श्याम प्राणधन अति जिय भोरी॥
आप सदा किशोरी, गोरी राधा हैं — श्याम का प्राणधन और मन की बहुत भोली।
करुणा सागर हिय उमंगिनी। ललितादिक सखियन की संगिनी॥
आप करुणा का सागर हैं, हृदय में उमंग भरी; ललिता आदि सखियों की संगिनी हैं।
दिनकर कन्या कूल विहारिनि। कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि॥
सूर्य-पुत्री यमुना के किनारे विहार करने वाली, कृष्ण की प्राणप्रिया, उनके हृदय को आनंदित करने वाली।
नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं। राधा राधा कहि हरषावैं॥
श्याम रोज़ आपके गुण गाते हैं और ‘राधा-राधा’ कहकर प्रसन्न होते हैं।
मुरली में नित नाम उचारें। तुव कारण लीला वपु धारें॥
बाँसुरी में रोज़ आपका नाम पुकारते हैं; आपके लिए ही लीला-शरीर धारण करते हैं।
प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी। श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी॥
आप प्रेम का स्वरूप, अत्यंत कोमल, श्याम की प्रिया और वृषभानु की दुलारी हैं।
नवल किशोरी अति छवि धामा। द्युति लघु लगै कोटि रति कामा॥
नई किशोरी, छवि की धाम — आपके आगे करोड़ों रति-कामदेव की चमक भी फीकी लगती है।
गौरांगी शशि निंदक बदना। सुभग चपल अनियारे नयना॥
गोरे अंगों वाली, चंद्रमा को भी लजाने वाले मुख वाली, सुंदर चंचल नुकीले नेत्रों वाली।
जावक युत युग पंकज चरना। नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना॥
महावर लगे कमल जैसे दोनों चरण, जिनकी पायल की ध्वनि प्रियतम का मन हर लेती है।
संतत सहचरि सेवा करहीं। महा मोद मंगल मन भरहीं॥
सखियाँ सदा आपकी सेवा करती हैं और मन में महा-आनंद व मंगल भरती हैं।
रसिकन जीवन प्राण अधारा। राधा नाम सकल सुख सारा॥
आप रसिक भक्तों के जीवन और प्राणों का आधार हैं; ‘राधा’ नाम सारे सुखों का सार है।
अगम अगोचर नित्य स्वरूपा। ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा॥
आप अगम, इंद्रियों से परे, नित्य स्वरूप हैं; ब्रज के राजा कृष्ण रात-दिन आपका ध्यान करते हैं।
उपजेउ जासु अंश गुण खानी। कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी॥
जिनके अंश से करोड़ों उमा, लक्ष्मी और ब्रह्माणी जैसी गुणों की खान उपजती हैं।
नित्य धाम गोलोक विहारिणि। जन रक्षक दुख दोष नसावनि॥
नित्य धाम गोलोक में विहार करने वाली, भक्तों की रक्षक, दुःख-दोष मिटाने वाली।
शिव अज मुनि सनकादिक नारद। पार न पाँइ शेष अरु शारद॥
शिव, ब्रह्मा, सनकादि मुनि, नारद, शेषनाग और सरस्वती भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।
राधा शुभ गुण रूप उजारी। निरखि प्रसन्न होत बनवारी॥
राधा के शुभ गुण और उजला रूप देखकर बनवारी (कृष्ण) प्रसन्न होते हैं।
ब्रज जीवन धन राधा रानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥
राधा रानी ब्रज का जीवन-धन हैं; उनकी अपार महिमा का बखान नहीं हो सकता।
प्रीतम संग देइ गलबाँही। बिहरत नित वृन्दावन माँही॥
प्रियतम के गले में बाँहें डालकर आप रोज़ वृंदावन में विहार करती हैं।
राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा। एक रूप दोउ प्रीति अगाधा॥
राधा ‘कृष्ण’ कहती हैं, कृष्ण ‘राधा’ — दोनों एक ही रूप हैं, प्रेम अथाह है।
श्री राधा मोहन मन हरनी। जन सुख दायक प्रफुलित बदनी॥
श्री राधा मोहन का मन हरने वाली, भक्तों को सुख देने वाली, खिले मुख वाली हैं।
कोटिक रूप धरें नंद नंदा। दर्शन करन हित गोकुल चंदा॥
गोकुल के चंद्र नंदनंदन आपके दर्शन के लिए करोड़ों रूप धरते हैं।
रास केलि करि तुम्हें रिझावें। मान करौ जब अति दुःख पावें॥
रास-क्रीड़ा करके आपको रिझाते हैं; जब आप रूठती हैं तो बहुत दुखी होते हैं।
प्रफुलित होत दर्श जब पावें। विविध भांति नित विनय सुनावें॥
जब दर्शन पाते हैं तो खिल उठते हैं और तरह-तरह से रोज़ विनती करते हैं।
वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा। नाम लेत पूरण सब कामा॥
वृंदावन में विहार करने वाली श्यामा का नाम लेते ही सब काम पूरे हो जाते हैं।
कोटिन यज्ञ तपस्या करहु। विविध नेम व्रत हिय में धरहु॥
चाहे करोड़ों यज्ञ और तप करो, तरह-तरह के नियम-व्रत मन में धारो —
तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें। जब लगि राधा नाम न गावें॥
— तो भी श्याम उस भक्त को तब तक नहीं अपनाते, जब तक वह ‘राधा’ नाम नहीं गाता।
वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा। लीला वपु तव अमित अगाधा॥
राधा वृंदावन की स्वामिनी हैं; आपका लीला-स्वरूप अपार और अथाह है।
स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा। और तुम्हें को जानन हारा॥
स्वयं कृष्ण भी आपका पार नहीं पाते, तो और कौन आपको जान सकता है!
श्री राधा रस प्रीति अभेदा। सादर गान करत नित वेदा॥
श्री राधा का प्रेम-रस अभेद है; वेद भी आदर से रोज़ उसका गान करते हैं।
राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं। ते सपनेहुँ जग जलधि न तरि हैं॥
जो राधा को छोड़कर कृष्ण को भजेंगे, वे सपने में भी संसार-सागर पार नहीं कर पाएँगे।
कीरति कुँवरि लाड़िली राधा। सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा॥
कीर्ति माँ की लाड़ली राधा का स्मरण करते ही संसार की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं।
नाम अमंगल मूल नसावन। त्रिविध ताप हर हरि मनभावन॥
आपका नाम अमंगल की जड़ नष्ट करता है, तीनों ताप हरता है और हरि को भाता है।
राधा नाम लेइ जो कोई। सहजहि दामोदर बस होई॥
जो कोई ‘राधा’ नाम लेता है, दामोदर (कृष्ण) सहज ही उसके वश में हो जाते हैं।
राधा नाम परम सुखदाई। भजतहिं कृपा करहिं यदुराई॥
राधा नाम परम सुख देने वाला है; इसे भजते ही यदुराज कृष्ण कृपा करते हैं।
यशुमति नन्दन पीछे फिरिहैं। जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं॥
जो राधा नाम का स्मरण करेगा, यशोदा-नंदन उसके पीछे-पीछे घूमेंगे।
रास विहारिणि श्यामा प्यारी। करहु कृपा बरसाने वारी॥
हे रास में विहार करने वाली प्यारी श्यामा, बरसाने वाली, कृपा कीजिए।
वृन्दावन है शरण तिहारी। जय जय जय वृषभानु दुलारी॥
वृंदावन आपकी शरण है; हे वृषभानु-दुलारी, आपकी जय हो।
दोहा
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम। करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥
सबकी ईश्वरी श्री राधा और रसिकों के ईश्वर घनश्याम — मैं निरंतर श्री वृंदावन धाम में वास करूँ।
राधा चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।




