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गणेश चालीसा — पूरे बोल और अर्थ

‘जय गणपति सदगुण सदन’ से शुरू होने वाली गणेश चालीसा की रचना रामसुंदर जी ने की थी। इसमें गणेश जी के जन्म, उन्हें हाथी का सिर मिलने और प्रथम पूज्य बनने की कथा है।

बुधवार, संकष्टी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी पर इसका पाठ किया जाता है।

गणेश चालीसा — पूरे बोल और अर्थ

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

हे सद्गुणों के घर, कृपालु, विघ्न हरने और मंगल करने वाले गिरिजा-पुत्र गणपति, आपकी जय हो।

१

जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

हे गणों के राजा गणपति, आपकी जय हो; आप मंगल भरते हैं और शुभ काम पूरे करते हैं।

२

जै गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

हे हाथी के मुख वाले, सुख देने वाले, विश्व के नायक और बुद्धि के दाता, आपकी जय हो।

३

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड्र भाल मन भावन॥

टेढ़ी सूँड़ सुंदर लगती है और माथे पर त्रिपुंड तिलक मन को भाता है।

४

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

छाती पर मणि-मोतियों की माला, सिर पर सोने का मुकुट और बड़ी-बड़ी आँखें हैं।

५

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; मोदक का भोग और सुगंधित फूल चढ़ते हैं।

६

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

शरीर पर सुंदर पीले वस्त्र हैं और आपकी चरण-पादुका मुनियों के मन में बसती है।

७

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥

धन्य हैं शिव-पुत्र, कार्तिकेय के भाई, गौरी के लाल, जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं।

८

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

ऋद्धि-सिद्धि आपको चँवर डुलाती हैं और द्वार पर मूषक वाहन शोभा देता है।

९

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥

अब आपके जन्म की पवित्र और मंगलकारी कथा कहता हूँ।

१०

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥

एक बार पर्वतराज की पुत्री पार्वती ने पुत्र के लिए भारी तप किया।

११

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

जब वह अनुपम यज्ञ पूरा हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर पहुँचे।

१२

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अतिथि जानकर गौरी प्रसन्न हुईं और उन्होंने तरह-तरह से आपकी सेवा की।

१३

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

बहुत प्रसन्न होकर आपने वर दिया, क्योंकि माँ ने पुत्र के लिए तप किया था।

१४

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥

कि तुम्हें बिना गर्भ धारण किए, इसी समय, विशाल बुद्धि वाला पुत्र मिलेगा।

१५

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रूप भगवाना॥

वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार होगा, सबसे पहले पूजा जाएगा और भगवान रूप होगा।

१६

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

ऐसा कहकर आप अंतर्धान हो गए और पालने में बालक के रूप में प्रकट हुए।

१७

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

शिशु बनकर जब आप रोने लगे, तो आपका मुख देखकर गौरी के सुख की सीमा न रही।

१८

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥

सब मगन होकर मंगल गाने लगे और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे।

१९

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥

शिव और पार्वती ने खूब दान लुटाया; देवता और मुनि पुत्र को देखने आए।

२०

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥

इतना आनंद-मंगल देखकर शनिदेव भी बालक को देखने आए।

२१

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥

अपनी दृष्टि का दोष मन में सोचकर शनि बालक को देखना नहीं चाहते थे।

२२

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥

गिरिजा को कुछ बुरा लगा और बोलीं — क्या मेरा उत्सव तुम्हें अच्छा नहीं लगा?

२३

कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥

शनि मन में सकुचाते हुए बोले — शिशु को मुझे दिखाकर क्या करोगी?

२४

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥

उमा को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने को कहा।

२५

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

जैसे ही शनि की दृष्टि पड़ी, बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।

२६

गिरिजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥

गिरिजा व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुख का वर्णन नहीं हो सकता।

२७

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥

कैलाश में हाहाकार मच गया कि शनि की दृष्टि से पुत्र का नाश हो गया।

२८

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥

तुरंत विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से हाथी का सिर काटकर ले आए।

२९

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

उसे बालक के धड़ पर लगाया, और शंकर ने मंत्र पढ़कर उसमें प्राण डाल दिए।

३०

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥

तब शंभु ने नाम गणेश रखा और उन्हें प्रथम पूज्य तथा बुद्धि का भंडार होने का वरदान दिया।

३१

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

जब शिव ने बुद्धि की परीक्षा ली, तो पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा।

३२

चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

कार्तिकेय भ्रम में परिक्रमा करने चल पड़े, जबकि आपने बैठकर बुद्धि से उपाय सोचा।

३३

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

आपने माता-पिता के चरण पकड़कर उनकी सात परिक्रमा कर लीं।

३४

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

'धन्य गणेश!' कहकर शिव का हृदय प्रसन्न हुआ और आकाश से देवताओं ने फूल बरसाए।

३५

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥

आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी नहीं गा सकते।

३६

मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥

मैं बुद्धिहीन, मलिन और दुखी हूँ; किस तरह आपकी विनती करूँ?

३७

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥

प्रभु के दास रामसुंदर, जो प्रयाग के ककरा-दुर्वासा क्षेत्र से हैं, आपका भजन करते हैं।

३८

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

हे प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए और अपनी कुछ शक्ति और भक्ति दीजिए।

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥

जो ध्यान से यह गणेश चालीसा पढ़ता है, उसके घर में रोज़ नया मंगल होता है और उसे संसार में सम्मान मिलता है।

सम्बन्ध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

ऋषि पंचमी के दिन, मंगलमूर्ति गणेश की यह चालीसा पूरी हुई।

श्री गणेश चालीसा का पाठ पूरा हुआ।

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पाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।

Shri Ganesh Chalisa — Lyrics in English

अंग्रेज़ी अक्षरों (Roman Hindi) में पढ़ें

Jai ganpati sadgun sadan, kavivar badan kripal ।
Vighna haran mangal karan, jai jai girijalal ॥

Jai jai jai ganpati ganraju ।
Mangal bharan karan shubh kaju ॥

Jai gajabdan sadan sukhdata ।
Vishva vinayak buddhi vidhata ॥

Vakra tund shuchi shund suhavan ।
Tilak tripundra bhal man bhavan ॥

Rajat mani muktan ur mala ।
Swarn mukut shir nayan vishala ॥

Pustak pani kuthar trishulan ।
Modak bhog sugandhit phulan ॥

Sundar pitambar tan sajit ।
Charan paduka muni man rajit ॥

Dhani shivasuvan shadanan bhrata ।
Gauri lalan vishva-vikhyata ॥

Riddhi-siddhi tav chanvar sudhare ।
Mushak vahan sohat dware ॥

Kahau janma shubh-katha tumhari ।
Ati shuchi pavan mangalkari ॥

Ek samay giriraj kumari ।
Putra hetu tap kinho bhari ॥

Bhayo yagya jab purn anupa ।
Tab pahunchyo tum dhari dwij rupa ॥

Atithi jani kai gauri sukhari ।
Bahuvidhi seva kari tumhari ॥

Ati prasann hvai tum var dinha ।
Matu putra hit jo tap kinha ॥

Milhi putra tuhi, buddhi vishala ।
Bina garbh dharan, yahi kala ॥

Gananayak, gun gyan nidhana ।
Pujit pratham, rup bhagvana ॥

As kahi antardhan rup hvai ।
Palna par balak swarup hvai ॥

Bani shishu, rudan jabhin tum thana ।
Lakhi mukh sukh nahin gauri samana ॥

Sakal magan, sukhamangal gavhin ।
Nabh te suran, suman varshavhin ॥

Shambhu, uma, bahu dan lutavhin ।
Sur munijan, sut dekhan avhin ॥

Lakhi ati anand mangal saja ।
Dekhan bhi aye shani raja ॥

Nij avgun guni shani man mahin ।
Balak, dekhan chahat nahin ॥

Girija kachhu man bhed barhayo ।
Utsav mor, na shani tuhi bhayo ॥

Kahan lage shani, man sakuchai ।
Ka karihau, shishu mohi dikhai ॥

Nahin vishvas, uma ur bhayau ।
Shani son balak dekhan kahau ॥

Padtahin, shani drig kon prakasha ।
Balak sir uri gayo akasha ॥

Girija girin vikal hvai dharni ।
So dukh dasha gayo nahin varni ॥

Hahakar machyo kailasha ।
Shani kinho lakhi sut ko nasha ॥

Turat garur charhi vishnu sidhayo ।
Kati chakra so gaj shir laye ॥

Balak ke dhar upar dharyo ।
Pran, mantra parhi shankar daryo ॥

Nam ganesh shambhu tab kinhe ।
Pratham pujya buddhi nidhi, var dinhe ॥

Buddhi pariksha jab shiv kinha ।
Prithvi kar pradakshina linha ॥

Chale shadanan, bharmi bhulai ।
Rache baith tum buddhi upai ॥

Charan matu-pitu ke dhar linhen ।
Tinke sat pradakshin kinhen ॥

Dhani ganesh kahi shiv hiy harshe ।
Nabh te suran suman bahu barse ॥

Tumhari mahima buddhi barai ।
Shesh sahasmukh sake na gai ॥

Main matihin malin dukhari ।
Karhun kaun vidhi vinay tumhari ॥

Bhajat ramasundar prabhudasa ।
Jag prayag, kakra, durvasa ॥

Ab prabhu daya din par kijai ।
Apni shakti bhakti kuchh dijai ॥

Shri ganesh yah chalisa, path karai kar dhyan ।
Nit nav mangal grih basai, lahe jagat sanman ॥

Sambandh apne sahasra dash, rishi panchmi dinesh ।
Puran chalisa bhayo, mangal murti ganesh ॥

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गणेश चालीसा में कौन सी कथा है?

इसमें माता पार्वती के तप से गणेश जी के जन्म, शनि की दृष्टि से सिर कटने, हाथी का सिर लगने और माता-पिता की परिक्रमा से प्रथम पूज्य बनने की कथा है।

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