रहना नहिं देस बिराना है — कबीरदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘रहना नहिं देस बिराना है’ कबीरदास की रचना है। कबीर कहते हैं — यह संसार पराया देश है, यहाँ हमेशा नहीं रहना। यह कागज़ की पुड़िया जैसा है जो पानी की बूँद पड़ते ही घुल जाए, काँटों की बाड़ी जैसा है जिसमें उलझकर मर जाना है। सतगुरु का नाम ही असली ठिकाना है।
कबीरदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

रहना नहिं देस बिराना है। यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है॥ यह संसार काँट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह संसार झाड़ और झाँखर, आग लगे बरि जाना है॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है॥
भावार्थ: कबीर कहते हैं — यह संसार पराया देश है, यहाँ हमेशा नहीं रहना। यह कागज़ की पुड़िया जैसा है जो पानी की बूँद पड़ते ही घुल जाए, काँटों की बाड़ी जैसा है जिसमें उलझकर मर जाना है। सतगुरु का नाम ही असली ठिकाना है।
रहना नहिं देस बिराना है — कबीरदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
