या लकुटी अरु कामरिया पर — रसखान — पूरे बोल और भावार्थ
‘या लकुटी अरु कामरिया पर’ रसखान की रचना है। रसखान कहते हैं — श्रीकृष्ण की इस लाठी और कंबल पर मैं तीनों लोकों का राज छोड़ दूँ। नंद की गायें चराने के सुख पर आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ भुला दूँ। ब्रज के वन, बाग़ और करील के कुंजों पर करोड़ों सोने के महल न्योछावर कर दूँ।
रसखान की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि नवोनिधि के सुख, नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥ रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं। कोटिक ए कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
भावार्थ: रसखान कहते हैं — श्रीकृष्ण की इस लाठी और कंबल पर मैं तीनों लोकों का राज छोड़ दूँ। नंद की गायें चराने के सुख पर आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ भुला दूँ। ब्रज के वन, बाग़ और करील के कुंजों पर करोड़ों सोने के महल न्योछावर कर दूँ।
या लकुटी अरु कामरिया पर — रसखान का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
