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आदित्य हृदय स्तोत्र — पूरा पाठ और हिंदी अर्थ

आदित्य हृदय स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड का हिस्सा है। रावण से अंतिम युद्ध से पहले थके हुए श्रीराम को अगस्त्य मुनि ने यह सूर्य-स्तुति दी थी; इसके तीन बार जप के बाद राम ने रावण का वध किया।

रविवार सुबह सूर्य को अर्घ्य देकर — साथ में सूर्य चालीसा और सूर्य के 12 नाम।

आदित्य हृदय स्तोत्र — पूरा पाठ और हिंदी अर्थ
१

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥

युद्ध से थके हुए श्रीराम रणभूमि में चिंता में डूबे खड़े थे, और सामने रावण युद्ध के लिए तैयार था।

२

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्। उपगम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवांस्तदा॥

तब देवताओं के साथ युद्ध देखने आए भगवान अगस्त्य मुनि श्रीराम के पास जाकर बोले —

३

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्। येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि॥

‘हे महाबाहु राम, यह सनातन रहस्य सुनो, जिससे हे वत्स, तुम युद्ध में सारे शत्रुओं को जीत लोगे।’

४

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम्॥

‘यह पवित्र आदित्य-हृदय सारे शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय दिलाने वाला, अक्षय और परम कल्याणकारी है; इसका नित्य जप करना चाहिए।’

५

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्। चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्॥

‘यह सारे मंगलों का मंगल है, सब पापों का नाश करता है, चिंता और शोक को शांत करता है और आयु बढ़ाने वाला उत्तम स्तोत्र है।’

६

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्। पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥

‘किरणों से भरे, उदय होते हुए, देवताओं और असुरों द्वारा नमस्कृत, संसार के स्वामी विवस्वान भास्कर की पूजा करो।’

७

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः। एष देवासुरगणाँल्लोकान्पाति गभस्तिभिः॥

‘यही सब देवताओं का आत्मा है, तेजस्वी है, किरणों से सबको जीवन देता है; यही अपनी किरणों से देवता, असुर और सब लोकों की रक्षा करता है।’

८

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥

‘यही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कंद, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चंद्रमा और जल के स्वामी वरुण है।’

९

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः। वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥

‘यही पितर, वसु, साध्य, अश्विनी कुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को बनाने वाला और प्रकाश देने वाला है।’

१०

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्। सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥

‘आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान, सोने जैसा भानु, हिरण्यरेता और दिवाकर —’

११

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्। तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥

‘हरे घोड़ों वाला, हज़ार किरणों वाला, सात घोड़ों वाला, मरीचिमान, अंधकार को मथने वाला, शंभु, त्वष्टा, मार्तंड, अंशुमान —’

१२

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः। अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥

‘हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, भास्कर, रवि, अग्नि को गर्भ में रखने वाला, अदिति-पुत्र, शंख और ठंड का नाश करने वाला —’

१३

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः। घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥

‘आकाश का स्वामी, अंधकार भेदने वाला, ऋग्-यजु-साम वेदों का ज्ञाता, घनघोर वर्षा कराने वाला, जल का मित्र, आकाश-मार्ग में तेज़ी से चलने वाला —’

१४

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः। कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः॥

‘तपाने वाला, मंडलधारी, मृत्यु, पिंगल रंग वाला, सबको तपाने वाला, कवि, विश्व रूप, महातेजस्वी, लाल रंग वाला, सबकी उत्पत्ति का कारण —’

१५

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते॥

‘नक्षत्रों, ग्रहों और तारों का स्वामी, विश्व का पालक, तेजस्वियों में भी तेजस्वी — हे बारह रूपों वाले (आदित्य), आपको नमस्कार।’

१६

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥

‘पूर्व के पर्वत (उदयाचल) और पश्चिम के पर्वत (अस्ताचल) रूप आपको नमस्कार; ज्योति-समूहों के पति और दिन के स्वामी को नमस्कार।’

१७

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥

‘जय रूप, कल्याणकारी जय देने वाले, हरे घोड़ों वाले को बार-बार नमस्कार; हे हज़ार किरणों वाले आदित्य, आपको बार-बार नमस्कार।’

१८

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥

‘उग्र, वीर और तेज़ गति वाले को नमस्कार; कमलों को खिलाने वाले मार्तंड को बार-बार नमस्कार।’

१९

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे। भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥

‘ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी, आदित्य के तेज वाले सूर्य, प्रकाशमान, सबको (प्रलय में) निगलने वाले, रौद्र रूप वाले को नमस्कार।’

२०

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥

‘अंधकार, ठंड और शत्रुओं का नाश करने वाले, अपार आत्मा वाले, कृतघ्नों को दंड देने वाले देव, ज्योतियों के पति को नमस्कार।’

२१

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे। नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥

‘तपे हुए सोने जैसी आभा वाले, अग्नि रूप, विश्व के रचयिता, अंधकार मिटाने वाले, कांतिमान, संसार के साक्षी को नमस्कार।’

२२

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥

‘यही प्रभु प्राणियों का नाश करते हैं और यही फिर रचते हैं; यही अपनी किरणों से (जल) सोखते, तपाते और बरसाते हैं।’

२३

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः। एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥

‘यह सब प्राणियों में बसकर उनके सोते समय भी जागता है; यही अग्निहोत्र है और अग्निहोत्र करने वालों का फल भी।’

२४

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च। यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥

‘वेद, यज्ञ और यज्ञों का फल — संसार में जितने भी कर्म हैं, उन सबके प्रभु यही सूर्य हैं।’

२५

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन्पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥

‘हे राघव, विपत्ति, कठिनाई, घने जंगल या भय के समय जो इनका कीर्तन करता है, वह कभी दुखी नहीं होता।’

२६

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्। एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥

‘एकाग्र होकर देवों के देव, जगत के स्वामी की पूजा करो; इसे तीन बार जपकर तुम युद्ध में विजय पाओगे।’

२७

अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि। एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥

‘हे महाबाहु, इसी क्षण तुम रावण का वध करोगे।’ ऐसा कहकर अगस्त्य मुनि जैसे आए थे वैसे चले गए।

२८

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा। धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥

यह सुनकर महातेजस्वी राघव का शोक मिट गया; प्रसन्न होकर और मन को संयमित करके उन्होंने इसे धारण किया।

२९

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्। त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥

सूर्य को देखकर इसका जप करने से उन्हें परम आनंद मिला; तीन बार आचमन करके, पवित्र होकर, पराक्रमी राम ने धनुष उठाया।

३०

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्। सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥

रावण को देखकर प्रसन्न मन से वे युद्ध के लिए आगे बढ़े और पूरी शक्ति से उसके वध का संकल्प किया।

३१

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः। निशिचरपतिसङ्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥

तब देवताओं के बीच स्थित सूर्यदेव ने राम को देखा और राक्षसराज का अंत निकट जानकर अत्यंत प्रसन्न होकर कहा — ‘शीघ्रता करो।’

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ पूरा हुआ।

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पाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।

साथ में गाएँ — वीडियो

Aditya Hriday Stotra — Lyrics in English

अंग्रेज़ी अक्षरों (Roman Hindi) में पढ़ें

Tato yuddhparishrantan samre chintaya sthitam ।
Ravanan chagrato drishtva yuddhay samupasthitam ॥

Daivataishch samagamya drashtumabhyagto ranam ।
Upagamyabravidramamagastyo bhagavanstada ॥

Ram ram mahabaho shrinu guhyan sanatanam ।
Yen sarvanarinvats samre vijayishyasi ॥

Adityahridayan punyan sarvashatruvinashanam ।
Jayavahan japennityamakshayyan paraman shivam ॥

Sarvamangalamangalyan sarvapapapranashanam ।
Chintashokaprashamanamayurvardhanamuttamam ॥

Rashmimantan samudyantan devasuranamaskritam ।
Pujayaswa vivaswantan bhaskaran bhuvaneshvaram ॥

Sarvadevatmako hyesh tejaswi rashmibhavanah ।
Esh devasuragananllokanpati gabhastibhih ॥

Esh brahma cha vishnushch shivah skandah prajaptih ।
Mahendro dhanadah kalo yamah somo hyapan patih ॥

Pitro vasavah sadhya hyashvinau maruto manuh ।
Vayurvahnih prajah pran ritukarta prabhakarah ॥

Adityah savita suryah khagah pusha gabhastiman ।
Suvarnasdrisho bhanurhiranyareta divakarah ॥

Haridashvah sahasrarchih saptasaptirmarichiman ।
Timironmathanah shambhustvashta martand anshuman ॥

Hiranyagarbhah shishirastapno bhaskaro ravih ।
Agnigarbho'diteh putrah shankhah shishiranashanah ॥

Vyomanathastamobhedi rigyajuhsamaparagah ।
Ghanavrishtirpan mitro vindhyavithiplavangamah ॥

Atpi mandali mrityuh pingalah sarvatapanah ।
Kavirvishvo mahateja raktah sarvabhavodbhavah ॥

Nakshatragrahataranamdhipo vishvabhavanah ।
Tejasampi tejaswi dwadashatmannamo'stu te ॥

Namah purvay girye pashchimayadraye namah ।
Jyotirgananan patye dinadhiptaye namah ॥

Jayay jayabhadray haryashvay namo namah ।
Namo namah sahasransho adityay namo namah ॥

Nam ugray viray sarangay namo namah ।
Namah padmaprabodhay martanday namo namah ॥

Brahmeshanachyuteshay suryayadityavarchase ।
Bhaswate sarvabhakshay raudray vapushe namah ॥

Tamoghnay himaghnay shatrughnayamitatmane ।
Kritaghnaghnay devay jyotishan patye namah ॥

Taptachamikarabhay vahnaye vishvakarmane ।
Namastamo'bhinighnay ruchye lokasakshine ॥

Nashayatyesh vai bhutan tadev srijti prabhuh ।
Payatyesh tapatyesh varshatyesh gabhastibhih ॥

Esh supteshu jagarti bhuteshu parinishthitah ।
Esh evagnihotran cha phalan chaivagnihotrinam ॥

Vedashch kratavashchaiv kratunan phalmev cha ।
Yani krityani lokeshu sarva esh ravih prabhuh ॥

Enamapatsu krichchhreshu kantareshu bhayeshu cha ।
Kirtayanpurushah kashchinnavasidti raghav ॥

Pujayaswainamekagro devdev jagatpatim ।
Etattrigunitan japtva yuddheshu vijayishyasi ॥

Asminkshane mahabaho ravanan tvan vadhishyasi ।
Evamuktva tadagastyo jagam cha yathagatam ॥

Etachchhrutva mahateja nashtashoko'bhavattada ।
Dharayamas suprito raghavah prayatatmavan ॥

Adityan prekshya japtva tu paran harshamavaptavan ।
Trirachamya shuchirbhutva dhanuraday viryavan ॥

Ravanan prekshya hrishtatma yuddhay samupagamat ।
Sarvayatnen mahta vadhe tasya dhrito'bhavat ॥

Ath raviravadannirikshya raman muditmanah paraman prahrishyamanah ।
Nishicharapatisankshayan viditva suraganamadhyagto vachastvareti ॥

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आदित्य हृदय स्तोत्र कहाँ से है?

वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड से; अगस्त्य मुनि ने रणभूमि में श्रीराम को इसका उपदेश दिया था।

आदित्य हृदय स्तोत्र कब पढ़ें?

सूर्योदय के समय, खासकर रविवार को; पौष मास और मकर संक्रांति पर इसका रोज़ पाठ शुभ माना जाता है।

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