सूर्य चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘जय सविता जय जयति दिवाकर’ वाली सूर्य चालीसा में सूर्य के बारह नाम, सूर्य नमस्कार का फल, शरीर के हर अंग की रक्षा करने वाला कवच और हर महीने के सूर्य के नाम आते हैं।
रविवार सुबह, अर्घ्य देने के बाद; छठ पूजा और मकर संक्रांति पर विशेष — सूर्य के 12 नाम मंत्र।

दोहा
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अंग। पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग॥
सोने जैसा शरीर, मकर के आकार के कुंडल, गले में मोतियों की माला — शंख और चक्र लिए, कमल पर विराजे सूर्यदेव का ध्यान कीजिए।
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर। सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥
हे सविता, हे दिवाकर, आपकी जय हो; हज़ार किरणों वाले, सात घोड़ों वाले, अंधकार हरने वाले।
भानु पतंग मरीची भास्कर। सविता हंस सुनूर विभाकर॥
भानु, पतंग, मरीचि, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर — ये सब आपके नाम हैं।
विवस्वान आदित्य विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तंड, हरिरूप और विरोचन भी आप ही हैं।
अम्बरमणि खग रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
आप आकाश की मणि, खग और रवि कहलाते हैं; वेद आपको हिरण्यगर्भ कहकर गाते हैं।
सहस्रांशु प्रद्योतन कहि कहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोद लहि॥
सहस्रांशु, प्रद्योतन कह-कहकर मुनिगण आनंद पाते और प्रसन्न होते हैं।
अरुण सदृश सारथी मनोहर। हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
अरुण जैसे सुंदर सारथी रथ पर बैठकर आपके सात घोड़ों को हाँकते हैं।
मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥
आपके मंडल की महिमा अनोखी है; आपके तेजस्वी रूप पर सब न्योछावर हैं।
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
उच्चैःश्रवा जैसे घोड़े आपके रथ में जुते हैं, जिन्हें देखकर इंद्र भी लजा जाते हैं।
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग —
पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहि कै॥
— पूषा, रवि, आदित्य के नाम लेकर और ‘हिरण्यगर्भाय नमः’ कहकर —
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥
— जो ये बारह नाम प्रेम से गाते हैं और बारह बार सिर झुकाते हैं (सूर्य नमस्कार) —
चार पदारथ जन सो पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
— वे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पाते हैं; उनके दुःख, दरिद्रता और पापों का ढेर नष्ट होता है।
नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥
यह नमस्कार का चमत्कार है; इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की कृपा का सार है।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
हे भानु, जो मन लगाकर आपकी सेवा करता है, वह आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ पाता है।
बारह नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥
बारह नामों का उच्चारण करने से हज़ार जन्मों के पाप टल जाते हैं।
उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
जो भक्त आपकी कथा कहते-सुनते हैं, वे उसी क्षण शत्रु पर विजय पाते हैं।
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
धन और संतान सहित परिवार बढ़ता है; मोह का मज़बूत फंदा कट जाता है।
अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
(अब सूर्य-कवच:) अर्क सिर की रक्षा करते हैं; रवि माथे पर सदा रहते हैं।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
सूर्य आँखों पर विराजते हैं; दिनकर कानों की रक्षा करते हैं।
भानु नासिका वास करहु नित। भास्कर करत सदा मुख को हित॥
भानु नाक में बसें; भास्कर सदा मुख का भला करें।
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
पर्जन्य हमारे होंठों की और तीक्ष्ण जीभ की रक्षा करें।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
सुवर्णरेता कंठ की शोभा बढ़ाएँ; तिग्मतेजा कंधों पर रहें।
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
पूषा भुजाओं पर, मित्र पीठ पर, त्वष्टा और वरुण भी रक्षा करें।
युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
दोनों हाथों की रक्षा के लिए भानुमान, और छाती व पेट की रक्षा के लिए भी वे रहें।
बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटि मंह हंस रहत मन मुदभर॥
सुंदर आदित्य नाभि में और हंस कमर में आनंद से रहें।
जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
जाँघों पर गोपति और सविता, गुप्त अंगों पर दिवाकर रक्षा करें।
विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥
विवस्वान पैरों की रखवाली करें; अंधकार हरने वाले बाहर से रक्षा करें।
सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥
सहस्रांशु पूरे शरीर को सँभालें — यह अद्भुत रक्षा-कवच है।
अस जो जन अपने मन माहीं। भय जग बीच करहुं तेहि नाहीं॥
जो व्यक्ति इसे मन में धारण करता है, उसे संसार में कोई भय नहीं रहता।
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै। जो जन याको मन मंह जापै॥
जो इसे मन में जपता है, उसे दाद-कुष्ठ जैसे चर्म रोग कभी नहीं होते।
अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
आप संसार का अंधकार हरते हैं और नए प्रकाश से आनंद भरते हैं।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
जिन्हें ग्रह-गण भी ग्रसकर मिटा नहीं सकते, उन्हें मैं करोड़ों बार प्रणाम करता हूँ।
मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
जिनके पुत्र शनि (मंद) और धर्मराज यम जैसे अद्भुत हैं —
धन्य धन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुर मुनि नर सेवा॥
हे दिन की मणि सूर्यदेव, आप धन्य हैं; देवता, मुनि और मनुष्य सब आपकी सेवा करते हैं।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटत सो भव के भ्रम सों॥
जो भक्ति-भाव और पूरे नियम से आपको पूजता है, वह संसार के भ्रम से दूर हो जाता है।
परम धन्य सों नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
वह मनुष्य परम धन्य है, जिस पर अंधकार हरने वाले सूर्यदेव प्रसन्न हैं।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
(बारह महीनों के सूर्य:) माघ में अरुण, फाल्गुन में सूर्य, चैत्र में वेदांग नाम से रवि उदय होते हैं।
भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
वैशाख में भानु, ज्येष्ठ में इंद्र और आषाढ़ में रवि नाम से गाए जाते हैं।
यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥
भादों में यम, आश्विन में हिमरेता और कार्तिक में दिवाकर अगुआ होते हैं।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं॥
अगहन में भिन्न, पौष में विष्णु और अधिक मास (मलमास) में पुरुष नाम से रवि होते हैं।
दोहा
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य। सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥
जो लोग प्रेम से रोज़ यह सूर्य चालीसा गाते हैं, वे तरह-तरह के सुख-संपत्ति पाकर सदा सफल रहते हैं।
सूर्य चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।

