राजा हिम के पुत्र की कथा
राजा हिम के घर पुत्र हुआ तो ज्योतिषियों ने बताया कि विवाह के चौथे दिन साँप के काटने से उसकी मृत्यु होगी। समय आने पर राजकुमार का विवाह हुआ। उसकी पत्नी बहुत समझदार थी और उसे यह बात पता थी।
चौथे दिन की रात उसने पति को सोने नहीं दिया। कमरे के दरवाज़े पर अपने सारे सोने-चाँदी के गहने और सिक्कों का ढेर लगा दिया और चारों ओर ढेर सारे दीपक जला दिए। फिर वह रात भर पति को कहानियाँ सुनाती और भजन गाती रही।
आधी रात को यमराज साँप का रूप लेकर आए, पर दीपकों और गहनों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे कमरे में नहीं जा सके और गहनों के ढेर पर बैठकर गीत सुनते रहे। सुबह होते ही वे चुपचाप लौट गए और राजकुमार की जान बच गई।
तभी से धनतेरस की शाम घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज के नाम का दीपक जलाने की परंपरा है, ताकि परिवार में अकाल मृत्यु का डर न रहे।
भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य
समुद्र मंथन के समय कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे आयुर्वेद और अच्छे स्वास्थ्य के देवता हैं, इसलिए धनतेरस को ‘धन्वंतरि जयंती’ भी कहते हैं। कलश के साथ प्रकट होने के कारण इस दिन बर्तन ख़रीदने की परंपरा बनी।
यह कथा पारंपरिक कथा का OmKiran Bhakti द्वारा सरल हिंदी में किया गया पुनर्कथन है; अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के विवरण में थोड़ा अंतर मिलता है।


