गंगा चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग’ से शुरू होने वाली गंगा चालीसा सुंदरदास जी की रचना मानी जाती है। इसमें भगीरथ के तप, शिव की जटा में गंगा के समाने और तीन धाराओं (मंदाकिनी, भागीरथी, प्रभावती) की कथा है।
कार्तिक पूर्णिमा और गंगा दशहरा पर गंगा स्नान के बाद — साथ में गंगा आरती।

दोहा
जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग। जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥
हे जगत को पवित्र करने वाली देव-नदी गंगा, आपकी जय हो; शिव की जटाओं में बसने वाली, अनुपम ऊँची लहरों वाली, आपकी जय हो।
चौपाई
जय जय जननी हरण अघ खानी। आनंद करनी गंगा महारानी॥
हे माता, पापों की खान को हरने वाली, आनंद देने वाली गंगा महारानी, आपकी जय हो।
जय भगीरथी सुरसरि माता। कलिमल मूल दलिनी विख्याता॥
हे भगीरथ द्वारा लाई गई देव-नदी माता, आप कलियुग के पापों की जड़ कुचलने के लिए प्रसिद्ध हैं।
जय जय जह्नु सुता अघ हननी। भीष्म की माता जग जननी॥
हे जह्नु ऋषि की पुत्री (जाह्नवी), पाप नष्ट करने वाली, भीष्म की माता, जगत-जननी, आपकी जय हो।
धवल कमल दल मम तनु साजै। लखि शत शरद चंद्र छवि लाजै॥
सफ़ेद कमल की पंखुड़ियों जैसा आपका शरीर सजा है; उसे देखकर सौ शरद-चंद्र भी लजा जाते हैं।
वाहन मकर विमल शुचि सोहै। अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥
आपका निर्मल वाहन मगर शोभा देता है; हाथ में अमृत-कलश देखकर मन मोहित हो जाता है।
जड़ित रत्न कंचन आभूषण। हिय मणि हार हरणितम दूषण॥
रत्न जड़े सोने के गहने और हृदय पर मणियों का हार है; आप सारे दोष हर लेती हैं।
जग पावनि त्रय ताप नसावनि। तरल तरंग तुंग मन भावनि॥
आप जग को पवित्र करती और तीनों ताप मिटाती हैं; आपकी चंचल ऊँची लहरें मन को भाती हैं।
जो गणपति अति पूज्य प्रधाना। इहूं ते प्रथम गंगा अस्नाना॥
जो गणेश जी सबसे पहले पूजे जाते हैं, उनसे भी पहले गंगा-स्नान का महत्व है।
ब्रह्म कमंडल वासिनी देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी॥
हे देवी, आप ब्रह्मा के कमंडल में रहने वाली और भगवान विष्णु के चरण-कमलों की सेविका हैं।
साठि सहस्र सगर सुत तारयो। गंगा सागर तीरथ धारयो॥
आपने राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों को तारा और गंगासागर तीर्थ बनाया।
अगम तरंग उठ्यो मन भावन। लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥
आपकी अथाह, मनभावन लहरें उठीं; सुंदर हरिद्वार तीर्थ को देखिए।
तीरथ राज प्रयाग अक्षयवट। धरयो मातु पुनि काशी करवट॥
तीर्थराज प्रयाग का अक्षयवट और फिर काशी — ये तीर्थ भी माँ ने ही बनाए।
धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी। तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी॥
धन्य हैं देव-नदी, जो स्वर्ग की सीढ़ी हैं और पितरों की अनगिनत पीढ़ियों को तारती हैं।
भागीरथ तप कियो अपारा। दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा॥
राजा भगीरथ ने अपार तप किया, तब ब्रह्मा ने आपकी धारा पृथ्वी को दी।
जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जटा महं रह्यो समाई॥
जब जगत-जननी गंगा वेग से गरजती हुई उतरीं, तो शिव जी की जटाओं में समा गईं।
वर्ष पर्यंत गंगा महारानी। रहीं शम्भु के जटा भुलानी॥
गंगा महारानी पूरे एक वर्ष तक शिव जी की जटाओं में भटकती रहीं।
पुनि भागीरथ शम्भुहिं ध्यायो। तब इक बूंद जटा से पायो॥
फिर भगीरथ ने शिव जी का ध्यान किया, तब जटा से एक बूँद धरती पर मिली।
ताते मातु भईं त्रय धारा। मृत्यु लोक नभ अरु पातारा॥
उससे माँ तीन धाराओं में बँट गईं — पृथ्वी, आकाश और पाताल।
गईं पाताल प्रभावति नामा। मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥
पाताल में प्रभावती नाम से और आकाश में सुंदर मंदाकिनी नाम से गईं।
मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि। कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥
पृथ्वी पर सुंदर जाह्नवी बनीं — कलियुग के पाप हरने वाली, अथाह, जग को पवित्र करने वाली।
धनि मइया तव महिमा भारी। धर्म धुरी कलि कलुष कुठारी॥
हे मैया, आप धन्य हैं, आपकी महिमा भारी है; आप धर्म की धुरी और कलियुग के पापों के लिए कुल्हाड़ी हैं।
मातु प्रभावति धनि मंदाकिनी। धनि सुर सरित सकल भय नासिनी॥
धन्य हैं माता प्रभावती, धन्य मंदाकिनी, धन्य देव-नदी जो सारे भय नष्ट करती हैं।
पान करत निर्मल गंगा जल। पावत मन इच्छित अनंत फल॥
निर्मल गंगाजल पीने से मनचाहे अनंत फल मिलते हैं।
पूर्व जन्म पुण्य जब जागत। तबहिं ध्यान गंगा महं लागत॥
जब पिछले जन्म के पुण्य जागते हैं, तभी गंगा में ध्यान लगता है।
जइ पगु सुरसरि हेतु उठावहिं। तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं॥
गंगा की ओर जितने कदम उठाए जाते हैं, उतने अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है।
महा पतित जिन काहु न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे॥
जिन महापापियों को किसी ने नहीं तारा, उन्हें आपके एक नाम ने तार दिया।
शत योजन हूं से जो ध्यावहिं। निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं॥
जो सौ योजन दूर से भी आपका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही विष्णुलोक पाते हैं।
नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥
आपका नाम भजने से अनगिनत पाप नष्ट होते हैं और निर्मल ज्ञान, बल व बुद्धि प्रकट होते हैं।
जिमि धन मूल धर्म अरु दाना। धर्म मूल गंगाजल पाना॥
जैसे धन का मूल धर्म और दान है, वैसे ही धर्म का मूल गंगाजल पीना है।
तव गुण गुणन करत दुख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत॥
आपके गुण गाने से दुःख भाग जाते हैं; घर-घर में संपत्ति और सद्बुद्धि बसती है।
गंगहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूं सज्जन पद पावत॥
जो नियम से रोज़ गंगा का ध्यान करता है, वह दुष्ट भी सज्जन बन जाता है।
बुद्धिहीन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥
बुद्धिहीन विद्या और बल पाता है; रोगी रोग से मुक्त हो जाता है।
गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखा नंगा कबहुं न रहहीं॥
जो ‘गंगा-गंगा’ कहता है, वह कभी भूखा-नंगा नहीं रहता।
निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥
मुख से ‘गंगा माई’ निकलते ही यमदूत कान दबाकर भाग जाते हैं।
महा अघिन अधमन कहं तारे। भए नरक के बंद किवारे॥
आपने बड़े-बड़े पापियों और अधमों को तार दिया, जिससे नरक के दरवाज़े बंद हो गए।
जो नर जपै गंग शत नामा। सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥
जो गंगा के सौ नाम जपता है, उसकी सारी सिद्धियाँ और कामनाएँ पूरी होती हैं।
सब सुख भोग परम पद पावहिं। आवागमन रहित ह्वै जावहिं॥
वह सब सुख भोगकर परम पद पाता है और जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।
धनि मइया सुरसरि सुख दैनी। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥
धन्य हैं सुख देने वाली गंगा मैया, धन्य है तीर्थराज त्रिवेणी (प्रयाग का संगम)।
ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा॥
ककरा गाँव, जहाँ दुर्वासा ऋषि का स्थान है — वहाँ के सुंदरदास गंगा जी के दास हैं (रचयिता)।
जो यह पढ़ै गंगा चालीसा। मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥
जो यह गंगा चालीसा पढ़ता है, उसे अटूट भक्ति मिलती है।
दोहा
नित नए सुख सम्पति लहैं, धरैं गंग का ध्यान। अंत समय सुरपुर बसैं, सादर बैठि विमान॥
जो गंगा का ध्यान करते हैं, वे रोज़ नए सुख-संपत्ति पाते हैं और अंत में आदर से विमान में बैठकर स्वर्ग जाते हैं।
गंगा चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
