विन्ध्येश्वरी माता की आरती — सुन मेरी देवी पर्वतवासनी, बोल और अर्थ
‘सुन मेरी देवी पर्वतवासनी’ माँ विंध्यवासिनी (विंध्याचल, मिर्ज़ापुर) की पारंपरिक लोक-आरती है। इसमें भक्त ध्यानू और अकबर की प्रसिद्ध लोककथा का भी ज़िक्र आता है।
नवरात्रि और शुक्रवार की शाम — साथ में जय अम्बे गौरी और वैष्णो माता आरती।

सुन मेरी देवी पर्वतवासनी, कोई तेरा पार न पाया। पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया॥
हे पर्वत पर रहने वाली देवी, मेरी विनती सुनो — आपकी महिमा का पार कोई नहीं पा सका। पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल लेकर मैंने आपको भेंट चढ़ाई है।
सुवा चोली तेरे अंग विराजे, केसर तिलक लगाया। नंगे पग माँ अकबर आया, सोने का छत्र चढ़ाया॥
आपके अंग पर हरी (तोते के रंग की) चोली शोभा देती है और माथे पर केसर का तिलक है। लोककथा है कि बादशाह अकबर भी नंगे पाँव आपके दरबार आया और सोने का छत्र चढ़ाया।
ऊँचे पर्वत बन्यो देवालय, नीचे शहर बसाया। सतयुग द्वापर त्रेता मध्ये, कलियुग राज सवाया॥
ऊँचे पर्वत पर आपका मंदिर बना है और नीचे नगर बसा है। सतयुग, त्रेता और द्वापर में भी आपकी महिमा थी, और कलियुग में आपका राज सवाया (और भी बढ़कर) है।
धूप दीप नैवेद्य आरती, मोहन भोग लगाया। ध्यानू भगत मैया तेरे गुण गाया, मनवांछित फल पाया॥
धूप, दीप, नैवेद्य और आरती के साथ मीठा भोग लगाया है। माँ, भक्त ध्यानू ने आपके गुण गाए और मनचाहा फल पाया।
सुन मेरी देवी पर्वतवासनी, कोई तेरा पार न पाया॥
आरती का समापन फिर से पहली पंक्ति से — हे पर्वतवासिनी माँ, आपकी महिमा अपार है।
विन्ध्येश्वरी माता की आरती का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।




