अयि गिरिनन्दिनि — महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् — पूरे 21 श्लोक और अर्थ
‘अयि गिरिनन्दिनि’ (महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्) माँ दुर्गा की सबसे लोकप्रिय संस्कृत स्तुति है, जो परंपरा से आदि शंकराचार्य की मानी जाती है। हर श्लोक ‘जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते’ पर समाप्त होता है।
नवरात्रि और दुर्गा पूजा में इसका पाठ और गायन सबसे ज़्यादा होता है।

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे पर्वत-पुत्री, पृथ्वी को आनंद देने वाली, विश्व को प्रसन्न रखने वाली, नंदी द्वारा पूजित, विंध्य पर्वत पर रहने वाली, विष्णु के साथ क्रीड़ा करने वाली, इंद्र द्वारा पूजित, नीलकंठ शिव की पत्नी, विशाल परिवार वाली और बहुत कुछ करने वाली भगवती — हे महिषासुर का वध करने वाली, सुंदर जटाओं वाली शैलपुत्री, आपकी जय हो।
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते। दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
देवताओं पर वरदान बरसाने वाली, दुर्धर और दुर्मुख असुरों को हराने वाली, सदा आनंद में रहने वाली, तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को प्रसन्न करने वाली, पाप हरने वाली, दानवों पर क्रोध करने वाली, घमंड सुखाने वाली देवी, आपकी जय हो।
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते। मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे जगत की माँ, मेरी माँ, कदंब वन में रहना पसंद करने वाली, सदा मुस्कुराने वाली, ऊँचे हिमालय की चोटी पर अपने घर में रहने वाली, मधु जैसी मधुर, मधु-कैटभ का नाश करने वाली, रास में रमने वाली देवी, आपकी जय हो।
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते। निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिन्होंने शत्रुओं के धड़ के सौ टुकड़े कर दिए, हाथियों की सूँड़ें काट दीं, जिनका सिंह शत्रु-हाथियों के मस्तक फाड़ देता है, जिन्होंने अपनी भुजाओं से योद्धाओं के सिर गिरा दिए — उन देवी की जय हो।
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते। दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
युद्ध में घमंडी शत्रुओं को मारने के लिए अजेय शक्ति धारण करने वाली, बुद्धिमान महाशिव को अपना दूत बनाने वाली, बुरे इरादों वाले दानवों के दूतों का अंत करने वाली देवी की जय हो।
अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे। दुमिदुमितामर दुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जो शरण में आई शत्रुओं की पत्नियों को भी अभय देती हैं, तीनों लोकों के कष्ट मिटाने वाला निर्मल त्रिशूल धारण करती हैं, जिनके लिए देवताओं के नगाड़े दिशाओं को गुँजा देते हैं — उन देवी की जय हो।
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते। शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिन्होंने केवल अपनी हुंकार से धूम्रलोचन को राख कर दिया, युद्ध में रक्तबीज और उससे उपजे असुरों को सुखा दिया, शुंभ-निशुंभ के महायुद्ध से भूत-पिशाचों को तृप्त किया — उन देवी की जय हो।
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके। कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
युद्ध में धनुष के साथ चमकते अंगों और खनकते कंगनों वाली, सुनहरे बाणों से योद्धाओं को मारने वाली, चतुरंगिणी सेना को रणभूमि में गिराने वाली देवी की जय हो।
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते। धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जो देव-स्त्रियों के ‘तत-थेई’ नृत्य, ताल-बद्ध गीतों और मृदंग की ‘धुधुकुट-धिंधिमि’ ध्वनि में आनंद लेती हैं, उन देवी की जय हो।
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते। नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिनकी ‘जय-जय’ के साथ सारा विश्व स्तुति करता है, जिनके नूपुरों की झनकार से शिव मोहित होते हैं, जो अर्धनारीश्वर रूप में नृत्य और सुंदर गायन में रमती हैं — उन देवी की जय हो।
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते। सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
अच्छे मन वाले देवताओं को प्रिय, फूलों जैसी सुंदर कांति वाली, चंद्रमा जैसे मुख वाली, भौंरों जैसी चंचल सुंदर आँखों वाली देवी की जय हो।
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते। शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
महायुद्ध में श्रेष्ठ योद्धाओं के साथ लड़ने वाली, लताओं जैसी भील-स्त्रियों से घिरी, खिले हुए लाल कोमल पत्तों जैसी सुंदर देवी की जय हो।
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते। अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
मतवाले गजराज जैसी शक्तिशाली, तीनों लोकों का आभूषण, चंद्रमा जैसी, रूप की सागर, पर्वतराज की पुत्री, सबके मन को मोहने वाली देवी की जय हो।
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले। अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
कमल की पंखुड़ी जैसी कोमल कांति वाली, चंद्रकला से सजे निर्मल माथे वाली, हंसों जैसी चाल वाली, भौंरों से घिरे फूलों से सजे बालों वाली देवी की जय हो।
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते। निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिनकी बाँसुरी की मधुर ध्वनि से कोयल भी लजा जाती है, जो पर्वत-कुंजों में भीलों के मधुर गीतों के बीच घूमती हैं, अपने गणों और शबरियों के साथ क्रीड़ा करती हैं — उन देवी की जय हो।
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयूखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे। जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जिनके पीले रेशमी वस्त्र की चमक चंद्रमा को भी फीका कर देती है, जिनके नख प्रणाम करते देवताओं-असुरों के मुकुट की मणियों से चमकते हैं — उन देवी की जय हो।
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते। सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हज़ार किरणों वाले सूर्य से भी अधिक तेजस्वी, सूर्य द्वारा पूजित, तारकासुर को मारने वाले कार्तिकेय की माता, राजा सुरथ और समाधि वैश्य की समाधि (तपस्या) से प्रसन्न होने वाली देवी की जय हो।
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्। तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे करुणा की धाम, कल्याणी, जो रोज़ आपके चरण-कमलों की सेवा करता है, वह लक्ष्मी का निवास क्यों न बने? आपके चरण ही परम पद हैं — ऐसा मानने वाले मुझे क्या नहीं मिलेगा?
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्। तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
जो सोने के कलशों के जल से आपके आँगन को सींचता है, वह स्वर्ग का सुख क्यों न पाए? हे देवताओं द्वारा पूजित, कल्याणी माँ, मैं आपके चरणों की शरण लेता हूँ।
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते। मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
आपके निर्मल चंद्र-मुख का दर्शन सब कुछ पवित्र कर देता है; उसे पाकर इंद्रपुरी की सुंदरियाँ भी फीकी लगती हैं। हे शिव-नाम रूपी धन वाली माँ, मेरा तो मानना है कि आपकी कृपा से क्या नहीं हो सकता?
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते। यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
हे उमा, मुझ दीन पर दया और कृपा करनी ही चाहिए; आप जगत की माता हैं, जैसी कृपालु हैं वैसी ही जानी जाती हैं। जो उचित हो वही कीजिए और मेरा भारी संताप दूर कीजिए — हे महिषासुरमर्दिनी, आपकी जय हो।
अयि गिरिनन्दिनि — महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।



