ऊधौ — सूरदास — पूरे बोल और भावार्थ
‘ऊधौ’ सूरदास की रचना है। भ्रमरगीत का यह पद गोपियों का उत्तर है। उद्धव ज्ञान और योग का संदेश लेकर आए हैं, तो गोपियाँ कहती हैं — उद्धव, हमारे दस-बीस मन नहीं हैं; एक ही मन था, वह श्याम के साथ चला गया। अब योग की आराधना किस मन से करें?
सूरदास की रचना। सभी संत भजन।
पाठभेद: यह पाठ प्रचलित संस्करणों से लिया गया है; अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। हम इसे मुद्रित संस्करण से मिलान कर रहे हैं।

ऊधौ, मन न भए दस बीस। एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस॥ इंद्री सिथिल भईं केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस। आसा लागि रहत तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस॥ तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस। सूर हमारैं नंदनंदन बिनु, और नहीं जगदीस॥
भावार्थ: भ्रमरगीत का यह पद गोपियों का उत्तर है। उद्धव ज्ञान और योग का संदेश लेकर आए हैं, तो गोपियाँ कहती हैं — उद्धव, हमारे दस-बीस मन नहीं हैं; एक ही मन था, वह श्याम के साथ चला गया। अब योग की आराधना किस मन से करें?
ऊधौ — सूरदास का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
