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देवउठनी एकादशी की कथा: पूजा विधि और गन्ने का मंडप

देवउठनी एकादशी 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को है। मान्यता है कि चातुर्मास के चार महीने की योगनिद्रा के बाद इसी दिन भगवान विष्णु जागते हैं, इसलिए इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। शाम को आँगन में चौक बनाकर गन्ने का मंडप सजाएँ, और ‘उठो देव, बैठो देव’ गाते हुए थाली-घंटी बजाकर भगवान को जगाएँ। व्रत का पारण 21 नवंबर को सुबह 6:48 के बाद करें।

देवउठनी एकादशी की कथा

एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा: “प्रभु, आप कभी दिन-रात जागते रहते हैं और कभी लाखों वर्षों तक सो जाते हैं। इससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है और मुझे भी आपकी सेवा से समय नहीं मिलता। आप हर साल नियम से विश्राम किया करें।”

भगवान मुस्कुराए और बोले: “देवी, तुमने ठीक कहा। मेरे जागने से सब देवताओं को और ख़ासकर तुम्हें विश्राम नहीं मिलता। इसलिए अब मैं हर साल वर्षा ऋतु में चार महीने शयन करूँगा। यह मेरी अल्पनिद्रा होगी। इस समय जो भक्त मेरी सेवा और मेरे शयन-उत्थान का उत्सव भाव से करेगा, उसके घर मैं तुम्हारे साथ निवास करूँगा।”

तभी से माना जाता है कि भगवान देवशयनी एकादशी को सोते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं, और इसी कारण इन दिनों विवाह जैसे शुभ काम रोक दिए जाते हैं।

दूसरी प्रचलित मान्यता राजा बलि से जुड़ी है: वामन अवतार में बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसके यहाँ रहने का वचन दिया था, और चातुर्मास के समय वे वहीं निवास करते हैं।

पूजा सामग्री

  • गन्ने (मंडप के लिए 4 या 5), फूलों की माला
  • भगवान विष्णु या शालिग्राम की तस्वीर या मूर्ति
  • तुलसी का गमला और एक दिन पहले तोड़े हुए तुलसी के पत्ते
  • गेरू और चावल का आटा (चौक और भगवान के चरण बनाने के लिए)
  • घी का दीपक, धूप, रोली, अक्षत, पीला कपड़ा
  • सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, मौसमी फल, गुड़ और मिठाई
  • सब सामान एक जगह: पूजा सामग्री ख़रीदें

गन्ने का मंडप कैसे बनाएँ

  1. शाम को आँगन या पूजा की जगह साफ़ करें और गेरू और चावल के आटे से चौक बनाएँ।
  2. चौक के चारों ओर गन्ने खड़े करके ऊपर से आपस में बाँध दें।
  3. मंडप को फूलों की माला से सजाएँ।
  4. बीच में पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या शालिग्राम को रखें। कई घरों में यहाँ भगवान के चरण भी बनाए जाते हैं।

पूजा की विधि: स्टेप बाय स्टेप

  1. दशमी की रात से सात्विक भोजन करें और चावल न खाएँ।
  2. एकादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें।
  3. शाम को दीपक जलाकर गणेश जी का ध्यान करें, फिर भगवान विष्णु को फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करें।
  4. भगवान को जगाएँ: परिवार के साथ ‘उठो देव, बैठो देव’ गाते हुए थाली, घंटी या शंख बजाएँ।
  5. ऊपर दी कथा पढ़ें या सुनें, फिर ॐ जय जगदीश हरे और एकादशी माता की आरती करें।
  6. प्रसाद बाँटें। घर में जगह-जगह दीये जलाएँ।
  7. अगले दिन 21 नवंबर को सुबह 6:48 के बाद दान देकर पारण करें।

इस दिन के नियम

  • एकादशी पर चावल न खाएँ।
  • तुलसी के पत्ते आज न तोड़ें, एक दिन पहले तोड़कर रखें। देखें: तुलसी के नियम।
  • व्रत के सामान्य नियम: एकादशी व्रत के नियम।
  • इस दिन से विवाह जैसे शुभ काम फिर शुरू होते हैं, पर अपना मुहूर्त पंडित जी से पक्का करवाएँ।

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह

देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी विवाह होता है, जिसमें शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु का विवाह तुलसी माता से कराया जाता है। 2026 में तुलसी विवाह 21 नवंबर, शनिवार को है, और कई जगह यह एकादशी के दिन ही कर लिया जाता है। पढ़ें: तुलसी विवाह की कथा।

जानकारी की जाँच: 27 अक्टूबर 2026। ये परंपराएँ और मान्यताएँ हैं; अपने परिवार की रीति को प्राथमिकता दें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

20 नवंबर 2026, शुक्रवार को। एकादशी तिथि 20 नवंबर सुबह 7:16 से 21 नवंबर सुबह 6:32 तक है।

देवउठनी एकादशी का पारण कब है?

21 नवंबर 2026 को सुबह 6:48 के बाद।

देवउठनी एकादशी क्यों मनाई जाती है?

मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास खत्म होता है।

देवउठनी एकादशी पर गन्ने का मंडप क्यों बनाते हैं?

गन्ने के मंडप में भगवान को बिठाकर पूजा करने की परंपरा है। कई जगह इसी दिन से नया गन्ना पूजा में चढ़ाया जाता है।

भगवान को कैसे जगाते हैं?

शाम की पूजा में ‘उठो देव, बैठो देव’ गाते हुए थाली, घंटी या शंख बजाकर।

क्या देवउठनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल नहीं खाए जाते।

देवउठनी एकादशी के बाद शादियाँ कब शुरू होती हैं?

चातुर्मास खत्म होने पर विवाह फिर शुरू हो जाते हैं, पर अपनी शादी का मुहूर्त पंडित जी से ही तय करवाएँ।

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह में क्या अंतर है?

देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु जागते हैं। तुलसी विवाह में शालिग्राम और तुलसी माता का विवाह होता है, जो 2026 में 21 नवंबर को है।

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