देवउठनी एकादशी की कथा
एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा: “प्रभु, आप कभी दिन-रात जागते रहते हैं और कभी लाखों वर्षों तक सो जाते हैं। इससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है और मुझे भी आपकी सेवा से समय नहीं मिलता। आप हर साल नियम से विश्राम किया करें।”
भगवान मुस्कुराए और बोले: “देवी, तुमने ठीक कहा। मेरे जागने से सब देवताओं को और ख़ासकर तुम्हें विश्राम नहीं मिलता। इसलिए अब मैं हर साल वर्षा ऋतु में चार महीने शयन करूँगा। यह मेरी अल्पनिद्रा होगी। इस समय जो भक्त मेरी सेवा और मेरे शयन-उत्थान का उत्सव भाव से करेगा, उसके घर मैं तुम्हारे साथ निवास करूँगा।”
तभी से माना जाता है कि भगवान देवशयनी एकादशी को सोते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं, और इसी कारण इन दिनों विवाह जैसे शुभ काम रोक दिए जाते हैं।
दूसरी प्रचलित मान्यता राजा बलि से जुड़ी है: वामन अवतार में बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसके यहाँ रहने का वचन दिया था, और चातुर्मास के समय वे वहीं निवास करते हैं।
पूजा सामग्री
- गन्ने (मंडप के लिए 4 या 5), फूलों की माला
- भगवान विष्णु या शालिग्राम की तस्वीर या मूर्ति
- तुलसी का गमला और एक दिन पहले तोड़े हुए तुलसी के पत्ते
- गेरू और चावल का आटा (चौक और भगवान के चरण बनाने के लिए)
- घी का दीपक, धूप, रोली, अक्षत, पीला कपड़ा
- सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, मौसमी फल, गुड़ और मिठाई
- सब सामान एक जगह: पूजा सामग्री ख़रीदें
गन्ने का मंडप कैसे बनाएँ
- शाम को आँगन या पूजा की जगह साफ़ करें और गेरू और चावल के आटे से चौक बनाएँ।
- चौक के चारों ओर गन्ने खड़े करके ऊपर से आपस में बाँध दें।
- मंडप को फूलों की माला से सजाएँ।
- बीच में पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या शालिग्राम को रखें। कई घरों में यहाँ भगवान के चरण भी बनाए जाते हैं।
पूजा की विधि: स्टेप बाय स्टेप
- दशमी की रात से सात्विक भोजन करें और चावल न खाएँ।
- एकादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें।
- शाम को दीपक जलाकर गणेश जी का ध्यान करें, फिर भगवान विष्णु को फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करें।
- भगवान को जगाएँ: परिवार के साथ ‘उठो देव, बैठो देव’ गाते हुए थाली, घंटी या शंख बजाएँ।
- ऊपर दी कथा पढ़ें या सुनें, फिर ॐ जय जगदीश हरे और एकादशी माता की आरती करें।
- प्रसाद बाँटें। घर में जगह-जगह दीये जलाएँ।
- अगले दिन 21 नवंबर को सुबह 6:48 के बाद दान देकर पारण करें।
इस दिन के नियम
- एकादशी पर चावल न खाएँ।
- तुलसी के पत्ते आज न तोड़ें, एक दिन पहले तोड़कर रखें। देखें: तुलसी के नियम।
- व्रत के सामान्य नियम: एकादशी व्रत के नियम।
- इस दिन से विवाह जैसे शुभ काम फिर शुरू होते हैं, पर अपना मुहूर्त पंडित जी से पक्का करवाएँ।
देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह
देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी विवाह होता है, जिसमें शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु का विवाह तुलसी माता से कराया जाता है। 2026 में तुलसी विवाह 21 नवंबर, शनिवार को है, और कई जगह यह एकादशी के दिन ही कर लिया जाता है। पढ़ें: तुलसी विवाह की कथा।
जानकारी की जाँच: 27 अक्टूबर 2026। ये परंपराएँ और मान्यताएँ हैं; अपने परिवार की रीति को प्राथमिकता दें।
