दुर्गा चालीसा — पूरे बोल और अर्थ
‘नमो नमो दुर्गे सुख करनी’ से शुरू होने वाली श्री दुर्गा चालीसा की रचना देवीदास ने की थी। इसमें माँ दुर्गा के अनेक रूपों और उनकी विजय-कथाओं का वर्णन है। नीचे हर चौपाई के साथ उसका सरल अर्थ दिया है।
नवरात्रि, अष्टमी और हर शुक्रवार को इसका पाठ विशेष माना जाता है।

चौपाई
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
सुख देने वाली दुर्गा माँ को नमस्कार, दुख हरने वाली अम्बे माँ को नमस्कार।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
आपकी ज्योति निराकार है और उसका प्रकाश तीनों लोकों में फैला है।
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
आपके माथे पर चंद्रमा है, मुख विशाल है, आँखें लाल और भौंहें विकराल हैं।
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥
माँ का रूप बहुत सुंदर है; दर्शन करके भक्त बहुत सुख पाते हैं।
तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
संसार की सारी शक्ति आप में समाई है; पालन के लिए आप अन्न और धन देती हैं।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
अन्नपूर्णा बनकर आप जगत का पालन करती हैं; आप ही आदि सुंदरी बाला हैं।
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
प्रलय के समय सबका नाश करने वाली आप ही हैं, और आप ही शिव की प्रिय गौरी हैं।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
शिव और योगी आपके गुण गाते हैं, ब्रह्मा और विष्णु रोज़ आपका ध्यान करते हैं।
रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
आपने सरस्वती का रूप धरकर ऋषि-मुनियों को सद्बुद्धि दी और उनका उद्धार किया।
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥
हे अम्बा, आपने ही नरसिंह का रूप धरा और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं।
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
आपने प्रह्लाद की रक्षा की और दैत्य को मुक्ति देकर स्वर्ग भेजा।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥
संसार में आपने लक्ष्मी का रूप धरा और श्री नारायण के साथ रहती हैं।
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
आप क्षीरसागर में निवास करती हैं; हे दया की सागर, मन की आशा पूरी कीजिए।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
हिंगलाज में भवानी आप ही हैं; आपकी असीम महिमा का वर्णन नहीं हो सकता।
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी — सुख देने वाली ये सब आप ही हैं।
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
भैरवी, जगत को तारने वाली तारा और छिन्नमस्ता बनकर आप संसार के दुख दूर करती हैं।
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
सिंह पर सवार भवानी शोभा पाती हैं और वीर लांगुर (हनुमान) आगे-आगे चलते हैं।
कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥
आपके हाथों में खप्पर और तलवार है, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
आपके अस्त्र और त्रिशूल शोभा देते हैं, जिनसे शत्रुओं के हृदय में भय उठता है।
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥
नगरकोट (कांगड़ा) में आप ही विराजती हैं और तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
आपने शुंभ-निशुंभ दानवों को मारा और रक्तबीज जैसे असंख्य राक्षसों का संहार किया।
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
महिषासुर बहुत अभिमानी था, उसके पापों के बोझ से धरती व्याकुल थी।
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
आपने काली का विकराल रूप धरकर उसे उसकी सेना सहित मार डाला।
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥
जब-जब संतों पर संकट आया, तब-तब माँ आपने उनकी सहायता की।
अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
अमरपुरी और इंद्रलोक आपकी महिमा से ही शोक-रहित रहते हैं।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
ज्वाला देवी में आपकी ज्योति जलती है और सब नर-नारी सदा आपको पूजते हैं।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाते हैं, उनके पास दुख और गरीबी नहीं आती।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥
जो मन लगाकर आपका ध्यान करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग संभव नहीं।
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
आचार्य शंकर ने तप करके काम और क्रोध पर विजय पाई।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
वे दिन-रात शिव का ध्यान करते रहे, पर कभी आपका स्मरण नहीं किया।
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥
वे शक्ति का रहस्य नहीं समझे; जब शक्ति चली गई तब मन में पछताए।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
तब वे आपकी शरण में आए और कीर्ति गाई — जय जय जय जगदम्बा भवानी।
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना देर किए उन्हें शक्ति लौटा दी।
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
हे माँ, मुझे बहुत कष्टों ने घेर रखा है; आपके बिना मेरा दुख कौन हरेगा?
आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥
आशा और लालच मुझे बहुत सताते हैं; मोह, अहंकार आदि सबको नष्ट कीजिए।
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
हे महारानी, शत्रुओं का नाश कीजिए; हे भवानी, मैं एकाग्र मन से आपको याद करता हूँ।
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥
हे दयालु माँ, कृपा कीजिए और ऋद्धि-सिद्धि देकर निहाल कर दीजिए।
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥
जब तक जीऊँ, आपकी दया पाता रहूँ और सदा आपका यश सुनाता रहूँ।
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥
जो दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर परम पद पाता है।
देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
देवीदास को अपनी शरण में जानकर, हे जगदम्बा भवानी, कृपा कीजिए।
दोहा
शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक। मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥
माँ शरण में आए हुए की रक्षा करती हैं, इसलिए भक्त निडर रहता है। हे माँ, मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे अपनी गोद में ले लीजिए।
श्री दुर्गा चालीसा का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।




