संकटनाशन गणेश स्तोत्र — प्रणम्य शिरसा देवं, अर्थ सहित
संकटनाशन गणेश स्तोत्र नारद पुराण से है। इसमें गणेश जी के बारह नाम हैं — वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र, लंबोदर, विकट, विघ्नराजेंद्र, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति और गजानन।
संकष्टी चतुर्थी और बुधवार को इसका तीन बार पाठ किया जाता है।

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्। भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये॥
(नारद जी कहते हैं) गौरी-पुत्र विनायक देव को सिर झुकाकर प्रणाम करें; भक्तों के हृदय में बसने वाले गणेश का रोज़ स्मरण करें, जिससे आयु, कामना और धन की सिद्धि हो।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्। तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥
पहला नाम वक्रतुंड, दूसरा एकदंत, तीसरा कृष्णपिंगाक्ष (काली-पीली आँखों वाले), चौथा गजवक्त्र (हाथी के मुख वाले)।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥
पाँचवाँ लंबोदर, छठा विकट, सातवाँ विघ्नराजेंद्र और आठवाँ धूम्रवर्ण।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्। एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥
नौवाँ भालचंद्र, दसवाँ विनायक, ग्यारहवाँ गणपति और बारहवाँ गजानन।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥
जो मनुष्य सुबह, दोपहर और शाम इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे विघ्नों का डर नहीं रहता; यह सब सिद्धियाँ देने वाला है।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम्॥
विद्या चाहने वाले को विद्या, धन चाहने वाले को धन, संतान चाहने वाले को संतान और मोक्ष चाहने वाले को मुक्ति मिलती है।
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्। संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥
इस गणपति स्तोत्र का जाप करने से छह महीने में फल मिलता है और एक वर्ष में सिद्धि मिलती है — इसमें संदेह नहीं।
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्। तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥
जो इसे लिखकर आठ ब्राह्मणों को भेंट करता है, उसे गणेश की कृपा से सारी विद्याएँ प्राप्त होती हैं।
संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।


