मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई — मीराबाई — पूरे बोल और हिंदी अर्थ
‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ मीराबाई का सबसे प्रसिद्ध पद है, जिसमें वे कहती हैं कि मोर-मुकुट वाले श्रीकृष्ण ही उनके पति हैं और उनके लिए उन्होंने कुल की मर्यादा और लोक-लाज छोड़ दी।
मीराबाई की रचना। यहाँ NCERT (कक्षा 11, आरोह) वाला पाठ है; गाए जाने वाले रूप में कुछ पंक्तियाँ अलग होती हैं। सभी संत भजन।
पाठभेद: अलग-अलग पुस्तकों और गायकों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं; यहाँ प्रचलित/मानक पाठ दिया है।

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
मेरे तो केवल गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोर-मुकुट है, वही मेरे पति हैं।
छाँड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई। संतन ढिग बैठि बैठि, लोक-लाज खोयी॥
मैंने कुल की मर्यादा की परवाह छोड़ दी है, अब कोई क्या कर लेगा? संतों के पास बैठ-बैठकर मैंने लोक-लाज छोड़ दी।
अँसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम-बेलि बोयी। अब त बेलि फैलि गयी, आणंद-फल होयी॥
आँसुओं के जल से सींच-सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई। अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लगने लगे हैं।
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोयी। दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी॥
जैसे दही को प्रेम से मथकर घी निकाल लिया जाता है और छाछ छोड़ दी जाती है, वैसे ही मैंने जीवन का सार (भक्ति) ले लिया और बाकी छोड़ दिया।
भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी। दासि मीरां लाल गिरधर! तारो अब मोही॥
भक्तों को देखकर मैं प्रसन्न होती हूँ और संसार की दशा देखकर रोती हूँ। हे गिरधर लाल, अपनी दासी मीरा का अब उद्धार करो।
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई — मीराबाई का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।
