गणेश पंचरत्न स्तोत्र — पूरा पाठ और हिंदी अर्थ
‘मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं’ वाला गणेश पंचरत्न आदि शंकराचार्य की रचना है। इसके पाँच ‘रत्न’ श्लोकों में विनायक के रूप और कृपा का वर्णन है; छठे श्लोक में रोज़ सुबह पाठ का फल बताया गया है।
बुधवार, संकष्टी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी पर — साथ में संकटनाशन गणेश स्तोत्र।

मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥
जो प्रसन्नता से हाथ में मोदक लिए हैं, सदा मुक्ति दिलाते हैं, चंद्रमा को मुकुट बनाकर पहनते हैं, संसार के लोगों की रक्षा करते हैं, अनाथों के एकमात्र नाथ हैं, गजासुर का नाश करने वाले हैं और झुकने वालों के अशुभ को तुरंत मिटाते हैं — उन विनायक को मैं नमस्कार करता हूँ।
नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम्। सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥
जो न झुकने वालों (अहंकारियों) के लिए भयंकर हैं, उगते सूरज जैसे दमकते हैं, देवता और असुर दोनों जिन्हें नमन करते हैं, जो शरणागतों को बड़ी विपत्तियों से उबारते हैं — उन देवेश्वर, निधियों के स्वामी, गजेश्वर, गणेश्वर, परात्पर महेश्वर का मैं सदा आश्रय लेता हूँ।
समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुञ्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम्। कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥
सारे लोकों का कल्याण करने वाले, दैत्य-हाथी का नाश करने वाले, बड़े पेट वाले, श्रेष्ठ, सुंदर हाथी-मुख वाले, अविनाशी, कृपा-क्षमा-आनंद-यश देने वाले और नमन करने वालों का मन पूरा करने वाले तेजस्वी गणेश को मैं नमस्कार करता हूँ।
अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम्। प्रपञ्चनाशभीषणं धनञ्जयादिभूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम्॥
गरीबों का दुःख पोंछने वाले, पुराने वेद-वचनों के पात्र, शिव के बड़े पुत्र, देवताओं के शत्रुओं का घमंड चबा जाने वाले, संसार के प्रलय में भयंकर, नागों को गहने बनाने वाले, मद-धारा वाले उन प्राचीन गजराज को मैं भजता हूँ।
नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम्। हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥
अत्यंत सुंदर दाँत की चमक वाले, यमराज का भी अंत करने वाले शिव के पुत्र, अचिंत्य रूप, अनंत, विघ्नों को काटने वाले, योगियों के हृदय में सदा बसने वाले — उन एकदंत का मैं निरंतर चिंतन करता हूँ।
महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन्गणेश्वरम्। अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात्॥
जो रोज़ सुबह हृदय में गणेश जी का स्मरण करते हुए आदर से इस ‘महागणेश पंचरत्न’ को पढ़ता है, वह जल्दी ही आरोग्य, निर्दोषता, अच्छी विद्या, अच्छी संतान, लंबी आयु और आठों ऐश्वर्य पाता है।
गणेश पंचरत्न स्तोत्र का पाठ पूरा हुआ।
किसी अपने को WhatsApp पर भेजेंपाठ पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। अर्थ सरल हिंदी में OmKiran Bhakti ने लिखा है। कोई त्रुटि दिखे तो YouTube पर कमेंट करके बताएँ।




